FCRA Amendment Bill Controversy: सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार संसद में जारी मानसून सत्र में विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (FCRA) संसोधन बिल पेश कर सकती है। सरकार ने बिल का कहना है कि वो यह बदलाव देशों में विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाना और नियमों का पालन सुनिश्चित करना है। हालांकि इस मुद्दे ने एक अलग ही रंग लेना शुरु कर दिया है।
सरकार द्वारा विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक लाने को लेकर विपक्ष हमलावर है, इसे अल्पसंख्यकों के विरुद्ध बता रही है। वहीं बिल के विरोध में अमेरिका और पश्चिमी देश बयान दे रहे हैं। हाल ही में अमेरिकी सांसद राइली मूर ने इस बिल को भारत में रहने वाले ईसाइयों पर हमला तक करार दे दिया। आइए आपको बताते हैं कि FCRA क्या है? ये कब और कैसे बना? और इसमें बदलाव से पश्चिमी देशों का क्या लेना देना है?
विदेशी अंशदान विनियमन अधिनिय (FCRA) भारत का कानून है, जो विदेश से मिलने वाले फंड पर नजर रखता है। इसका मकसद राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता बनाए रखना है। इस कानून के तहत गैर सरकारी संगठन (NGO), ट्रस्ट और अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं को विदेशी चंदे पाने किए पंजीकरण करना होती है। इसकी निगरानी गृह मंत्रालय करता है और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई कर सकता है। अब मोदी सरकार इसके ही कुछ नियमों में बदलाव करना चाहती है। इसके चलते भारत से लेकर अमेरिका तक में हड़कंप मचा हुआ है।
FCRA कानून 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में बनाया गया था। इस समय अमेरिका और सोवियत रूस के बीच कोल्ड वॉर अपने चरम पर था। सरकार को शक था कि दोनों देश भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एनजीओ का सहारा ले रहे हैं, जिससे राजनीति और समाज स्तर पर प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए विदेशी फंडिंग पर निगरानी रखने के लिए यह कानून लागू किया गया। इसके तहत राजनीतिक दलों और सरकारी कर्मचारियों के लिए विदेशी चंदा लेने पर रोक लगा दी गई। इस कानून में समय-समय पर कई बदलाव किए गए। साल 1984 में सरकार ने इसमें एक बड़ा बदलाव किया और जिन एनजीओ को विदेश से फंड मिलता था उनके लिए गृह मंत्रालय में पंजीकरण जरूरी कर दिया।
1984 के बाद FCRA कानून में बहुत अधिक बदलाव नहीं हुए। इसमें 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने 2010 में अहम बदलाव किए। हालांकि यह सरकार के लिए आसान नहीं था। सरकार 2005 से ही इसमें बदलाव करना चाहती थी, लेकिन हर बार संसद में यह पास नहीं हो पाता था। आखिरकार 2010 में यह संसद से पास हो गया।
मनमोहन सरकार ने 2010 में लाइसेंस की अवधि पांच साल किया और उसके नवीनीकरण अनिवार्य बनाया। वहीं 2020 में मोदी सरकार ने इसमें विदेशी धन केवल एसबीआई की नई दिल्ली शाखा के जरिए लेने, एक संस्था से दूसरी संस्था को विदेशी फंड देने पर रोक और प्रशासनिक खर्च की सीमा घटाकर 20 प्रतिशत करने जैसे बदलाव किए।
सरकार अब 2026 में कुछ नए बदलावों पर विचार कर रही है। सबसे अधिक चर्चा उस प्रस्ताव की हो रही है जिसके तहत यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है तो उसकी विदेशी फंडिंग और उससे जुड़ी संपत्ति सरकार के नियंत्रण में जा सकती है। इसके लिए एक अलग प्राधिकरण बनाने का भी प्रस्ताव है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि कानून की कुछ बातें स्पष्ट नहीं हैं जिससे मनमाने इस्तेमाल की आशंका पैदा हो सकती है।
सरकार और संघ से जुड़े कई संगठनों का लंबे समय से आरोप रहा है कि कुछ एनजीओ शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर विदेशी धन लेते हैं लेकिन उसका इस्तेमाल धर्मांतरण के लिए करते हैं। दूसरी ओर संबंधित संस्थाएं इन आरोपों को खारिज करती रही हैं और उनका कहना है कि उनका काम केवल सामाजिक सेवा और जरूरतमंद लोगों की मदद करना है।
बता दें कि सरकार और संस्थाओं के बीच की यह टकराव नया नहीं है। साल 2017 में अमेरिकी संस्था कंपैशन इंटरनेशनल को भारत में विदेशी फंडिंग से जुड़ी दिक्कतों के बाद अपना काम बंद करना पड़ा। सरकार ने उस पर धर्मांतरण से जुड़े आरोप लगाए थे जबकि संस्था ने इन्हें गलत बताया। साल 2022 में वर्ल्ड विजन इंडिया का पंजीकरण भी निलंबित किया गया। सरकार ने कहा कि विदेशी धन के इस्तेमाल को लेकर नियमों के उल्लंघन का संदेह था।
सरकार द्वारा FCRA संशोधन बिल पेश करने को लेकर अमेरिकी सांसद रैली मोर ने कहा कि प्रस्तावित बदलाव भारत के ईसाई समुदाय और चर्चों के कामकाज को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि अगर यह बदलाव होते हैं, तो यह अमेरिका और भारत के बीच द्विपक्षीय मुद्दा बन सकता है। वहीं भारत सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं है बल्कि इसका मकसद सिर्फ विदेशी फंडिंग को नियमों के अनुसार संचालित करना और पारदर्शिता बनाए रखना है।
केरल और पूर्वोत्तर के कई ईसाई संगठनों ने प्रस्तावित बदलावों पर चिंता जताई है। मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने भी इस मुद्दे पर गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। सरकार की ओर से भरोसा दिलाया गया कि कानून का मकसद किसी विशेष समुदाय के खिलाफ कार्रवाई करना नहीं बल्कि नियमों का पालन सुनिश्चित करना है। मेघालय और केरल में ईसाई समुदाय के लोग रहते हैं।