P. Chidambaram opinion on BJP: भारतीय राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है जिसे पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम (P. Chidambaram) ने 'इतिहास का निर्णायक क्षण' करार दिया है। हाल ही में एक लेख के माध्यम से उन्होंने देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रणनीति और आने वाले समय में लोकतंत्र की मजबूती के लिए विपक्षी गठबंधन की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की है।
पी चिदंबरम (P. Chidambaram) का मानना है कि भाजपा का लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि सत्ता में बने रहना है। उन्होंने भाजपा की कार्यप्रणाली की तुलना चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से की है, जिसका उद्देश्य एकदलीय शासन स्थापित करना रहा है। चिदंबरम के अनुसार, भारत और चीन के बीच बुनियादी अंतर हमारा संविधान है। भारत का संविधान बहुदलीय व्यवस्था की अनुमति देता है और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण को अनिवार्य बनाता है। लेकिन, भाजपा जिस तरह से अपनी शक्ति को संगठित कर रही है, वह चिंता का विषय है।
लेख में चिदंबरम ने स्पष्ट किया है कि भाजपा की विचारधारा का मुख्य केंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) है। आरएसएस का मानना है कि 'एक देश, एक भाषा, एक संस्कृति, और एक राजनीतिक दल' ही भारत के लिए आदर्श है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो भाजपा के प्रमुख चेहरा हैं, इसी विचारधारा को न केवल स्वीकार करते हैं, बल्कि इसे धरातल पर उतारने के लिए योजनाबद्ध कदम भी उठा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि 2014 के बाद से उठाए गए कदम, चाहे वह नागरिकता संशोधन कानून (CAA) हो, अनुच्छेद 370 हटाना हो या अन्य विधायी बदलाव, इसी विचारधारा को मजबूत करने की दिशा में हैं।
चिदंबरम (P. Chidambaram) ने केंद्र सरकार के 'वन नेशन, वन इलेक्शन' (एक देश, एक चुनाव) के प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि यह केवल चुनावी प्रक्रिया में सुधार नहीं, बल्कि विपक्ष को कमजोर करने की एक सोची-समझी रणनीति है। यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं, तो क्षेत्रीय दलों के लिए राष्ट्रीय स्तर की पार्टी (भाजपा) का मुकाबला करना अत्यंत कठिन हो जाएगा। उनका तर्क है कि इससे क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है और अंततः विपक्ष बिखर जाएगा। चूँकि भाजपा के पास साधन, संगठन और मीडिया का व्यापक तंत्र मौजूद है, इसलिए चुनावी सरलीकरण उनके लिए एक 'मास्टरस्ट्रोक' साबित हो सकता है।
अपने लेख में 2024 के लोकसभा परिणामों का जिक्र करते हुए चिदंबरम ने इसे भाजपा के लिए एक 'सबक' बताया है। भाजपा को 400 पार का लक्ष्य था, लेकिन उन्हें 240 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। यह दर्शाता है कि जनता ने कहीं न कहीं सत्ता के पूर्ण केंद्रीकरण पर रोक लगाने का प्रयास किया है। हालांकि, चिदंबरम चेतावनी देते हैं कि भाजपा अब 2029 की तैयारियों में जुट गई है। वे संविधान संशोधन के जरिए चुनावी सीमाओं में बदलाव और 'वन नेशन, वन इलेक्शन' जैसे सुधारों को लागू कर अपना प्रभाव फिर से बढ़ाना चाहते हैं।
इस तरह से देखा जाए पी. चिदंबरम के तर्कों से स्पष्ट है कि भारत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए 'दो बड़े गठबंधनों' का बनना अनिवार्य है। यदि विपक्ष एकजुट नहीं होता है, तो धीरे-धीरे छोटे दल खत्म हो जाएंगे और देश 'एक पार्टी, एक नेता' के शासन की ओर बढ़ जाएगा। उनका मानना है कि केंद्र में सत्ता के एकाधिकार को रोकने के लिए एक मजबूत विकल्प का होना जरूरी है, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणराज्य स्वरूप को अक्षुण्ण रख सके।
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कांग्रेस के नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी. चिदंबरम के इस संदेश स्पष्ट है कि यदि विपक्षी दल 2024 के परिणामों से सबक नहीं लेते हैं, तो वे अपनी प्रासंगिकता खोते चले जाएंगे। अब देश का जनमत व आने वाला समय यह तय करेगा कि भारतीय लोकतंत्र अपनी बहुदलीय संस्कृति को बचा पाता है या एक नया राजनीतिक ढांचा आकार लेता है, जिसके लिए भाजपा जोरशोर से जुटी है।