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साहिर लुधियानवी हिंदी सिनेमा के फेमस गीतकार और शायर थे।
'अभी न जाओ छोड़कर' उनके लिखे यादगार गीतों में शामिल है।
उनकी शायरी में मोहब्बत और सामाजिक सच्चाइयों की झलक मिलती है।
Sahir Ludhianvi Death Anniversary: हिंदी सिनेमा को अपनी बेमिसाल कलम से अमर गीत देने वाले साहिर लुधियानवी का नाम आज भी अदब और मोहब्बत की दुनिया में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी शायरी ने जहां एक तरफ आशिकों को अल्फ़ाज़ दिए, वहीं उनकी खुद की जिंदगी प्यार की कहानी अधूरी ही रह गई।
लुधियाना की एक रईस घराने से ताल्लुक रखने वाले अब्दुल हयी यानी साहिर का शुरुआती जीवन गरीबी और संघर्षों के बीच बीता, लेकिन उनके दिल में कला के प्रति जो आग भड़क रही थी, उसने उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।
साहिर जब सिर्फ 22 साल के थे, तब उनकी शायरी का पहला संग्रह 'तल्खियां' सामने आया था। इसी दौर में जब वे कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे, तब उनकी मुलाकात अमृता प्रीतम से हुई और दोनों के बीच गहरा प्यार पनपने लगा। हालांकि, इस रिश्ते के बीच धर्म की दीवार आ गई क्योंकि साहिर मुस्लिम थे और अमृता सिख फैमिली से ताल्लुक रखती थीं।
अमृता के पिता को यह रिश्ता बिल्कुल मंजूर नहीं था, जिसके चलते साहिर को कॉलेज से भी निकाल दिया गया। यह वह दौर था जिसने साहिर के दिल में प्यार की तड़प के बीज बो दिए थे।
कॉलेज से बाहर होने के बाद साहिर ने अपना जीवन चलाने के लिए कई छोटी-मोटी नौकरियां करते थे। साल 1943 में वे लाहौर चले गए और एक फेमस पत्रिका में संपादक के रूप में काम करने लगे। वहां उनके एक लेख को सरकार विरोधी मान लिया गया, जिसके बाद पाकिस्तानी प्रशासन ने उनके नाम अरेस्ट वॉरेंट जारी कर दिया।
हालात इतने बिगड़े कि उन्हें अपनी जान बचाने और करियर को नई दिशा देने के लिए साल 1949 में हमेशा के लिए भारत लौटना पड़ा, जहां उन्होंने अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया।
भारत आने के बाद साहिर के गानों का सफर तेजी से परवान चढ़ा। फिल्म 'नौजवान' के फेमस गाने 'ठंडी हवाएं लहरा के आएं' ने उन्हें रातों-रात शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। इसके बाद उन्होंने 'प्यासा', 'बाजी', अमिताभ बच्चन और रेखा की फिल्म 'कभी कभी' और 'फिर सुबह होगी' जैसी कई आइकॉनिक फिल्मों के लिए अमर गीत लिखे।
कहा जाता है कि अमृता प्रीतम के बाद उनकी जिंदगी में सुधा मल्होत्रा से भी नजदीकियां बढ़ीं, लेकिन इस बार भी मजहब की पाबंदियां उनके प्यार को मुकम्मल नहीं होने दे सकीं। उनका टूटा हुआ दिल और अंदर का दर्द अक्सर उनकी रचनाओं में छलक उठता था।
हिंदी सिनेमा के इतिहास में साहिर लुधियानवी ऐसे पहले गीतकार थे जिन्होंने अपनी कला के दम पर गानों की रॉयल्टी हासिल करने की परंपरा की शुरुआत की। भारत सरकार ने उनकी कला का सम्मान करते हुए उन्हें साल 1971 में फेमस पद्मश्री अवॉर्ड से नवाजा।
जीवनभर तन्हाई और टूटे दिलों के दर्द को अपनी शायरी में पिरोने वाले इस महान गीतकार का सफर 25 अक्टूबर 1980 को दिल का दौरा पड़ने से थम गया, लेकिन उनके लिखे हुए गाने आज भी हर प्रेमी की जुबान पर जिंदा हैं।