पंडित जसराज ने छोड़ा था तबला बजाना, खाई थी बला न काटने की कसम (सौ. सोशल मीडिया) 
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पंडित जसराज ने छोड़ा था तबला बजाना, खाई थी बला न काटने की कसम, जानें क्या थी वजह?

पंडित जसराज मेवाती घराने के गायक थे उन्होंने तबला वादक के रूप में शुरुआत की। अपमानजनक अनुभव से आहत होकर तबला छोड़कर गायन में पहचान बनाई। 1946 से संघर्षरत, 1952 में सफलता पाई और बाल कटवाने की प्रतिज्ञा पूरी की।

अदिति भंडारी

मुंबई: पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित जसराज एक महान तबला वादक थे। उनके संगीत, उनकी छीड़ी तान आज भी लोगों के कानों में गुंजती है। उन्होंने इस दुनिया को छोड़ा है लेकिन उनके संगीत ने आज भी उन्हें सभी के दिलों में जिंदा रखा है। जसराज को बचपन से ही शास्त्रीय संगीत में रुचि थी। लेकिन उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया कि उन्होंने तबला बजाना छोड़ दिया। आइए जानते हैं क्या है वो हैरान कर देने वाला किस्सा।

पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को हरियाणा के एक गांव में हुआ था। उनका ताल्लुक मेवाती घराने से था। उन्होंने संगीत की शिक्षा अपने पिता से ली थी। जसराज का पढ़ाई में मन नहीं लगता था। 3 साल की उम्र में ही संगीत ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया था। इसके बाद उन्होंने 6 साल की उम्र में स्कूल जाना शुरू किया था। उसी दौरान बेगम अख्तर का "दीवाना बना दे, वरना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे" रिकॉर्ड निकला था। इस गजल ने जसराज के दिल को छू लिया था। वे पूरे समय इसे गुनगुनाते रहते थे।

इसके बाद वक्त ने करवट ली और जसराज के पिता का देहांत हो गया, जिसके कारण उनके घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। एक इंटरव्यू में पंडित जसराज ने बताया था कि वे स्कूल से आकर घंटों तबला बजाते थे और रियाज करते थे। उनके एक भाई और थे जिनका नाम पंडित प्रताप नारायण था। वे म्यूजिक डायरेक्टर ललित-जतिन के पिता थे। उन्होंने बताया कि जब उनके भाई ने उन्हें तबला बजाते देखा तो उन्होंने उन्हें तबले की शिक्षा दिलवाई। जिसके बाद उन्हें किसी भी कार्यक्रम में तबला वादक को नहीं बुलाना पड़ता था, उसकी फीस बच जाती थी।

पंडित जसराज ने बताया कि इस वक्त प्रसिद्ध दिग्गज संगीतकार कुमार गंधर्व ने मेरे भाई से मुझे संगीत के एक कार्यक्रम में ले जाने की इजाजत मांगी। उस कार्यक्रम में मैंने उनका गाना सुना। उनके लिए बजाया। इस तरह मैं कई कार्यक्रमों में जाने लगा। एक बार पाकिस्तान के लाहौर में जन्माष्टमी का जश्न था। स्टेज सजाया गया। लेकिन वहां तबले और अन्य संगीत यंत्र नहीं थे। मैंने आयोजक से पूछा, "तबला कहां है?" उसने कहा, "गड्ढे में।" मैंने कहा, "गड्ढे में ऐसा क्यों? वो तो स्टेज पर होना चाहिए।" आयोजक ने कहा कि तबला बजाने वाले रागी के साथ बैठेंगे? ऐसा नहीं होता। उनकी जगह नीचे है। ये बात सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैं पंडाल से बाहर जाकर रोने लगा। मेरे भाई ने मुझे रोते देखा तो पूछा, "रो क्यों रहे हो? चलो अंदर, तबला बजाना है।" मैंने तबला बजाने से इंकार कर दिया। बाहर से किसी को फिर तबला बजाने के लिए बुलाया गया। उस दिन मैंने तबला बजाना छोड़ दिया और गाने लगा।

इसके बाद पंडित जसराज ने बताया कि उन्हें शास्त्रीय संगीत में वो पहचान नहीं मिली जो वो चाहते थे। इसलिए उन्होंने सन 1946 में कसम खाई कि वे तब तक बाल नहीं कटेंगे जब तक उन्हें वो पहचान नहीं मिलती। इसके बाद उन्हें 1952 में पहचान मिली जो वे चाहते थे, फिर उन्होंने बाल कटवाए।

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