बस्तर में आस्था और प्रकृति के रिश्ते की अनोखी मिसाल।
देवी बास्ताबुंदिन को काला चश्मा चढ़ाने की परंपरा है प्रचलित।
श्रद्धालु देवी मां से जंगल और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
जंगलों को बुरी नजर से बचाने के लिए निभाई जाती है यह परंपरा।
Unique Tadition with Nature in Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में आस्था और प्रकृति के रिश्ते की एक अनोखी मिसाल देखने को मिलती है। यहां देवी बास्ताबुंदिन को काला चश्मा चढ़ाने की परंपरा प्रचलित है। आमतौर पर देवी-देवताओं को फूल, नारियल, चुनरी और आभूषण अर्पित किए जाते हैं। लेकिन बस्तर की इस परंपरा में चश्मा विशेष स्थान रखता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार श्रद्धालु देवी को चश्मा चढ़ाकर अपने गांव, जंगल और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
आसपास रहने वालें ग्रामीणों के अनुसार कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र के कोटमसर गांव में देवी बास्ताबुंदिन से जुड़ी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। यहां लगभग तीन साल के अंतराल पर जात्रा आयोजित होने की जानकारी सामने आई है। इस आयोजन में स्थानीय श्रद्धालु अपनी आस्था के साथ शामिल होते हैं और देवी के समक्ष मन्नत मांगते हैं।
इस परंपरा की सबसे खास बात इसका प्रकृति से जुड़ा विश्वास है। स्थानीय लोग और मान्यता के अनुसार देवी की पूजा करने और उन्हें काला चश्मा अर्पित करने के पीछे जंगलों को बुरी नजर से बचाने तथा हरियाली बनाए रखने की कामना भी जुड़ी है। बस्तर के अनेक ग्रामीण समुदायों के जीवन में जंगलों की अहम भूमिका है। वनोपज, आजीविका और पारंपरिक जीवनशैली के लिए प्राकृतिक संसाधन महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में जंगलों की सलामती के लिए देवी से प्रार्थना करना प्रकृति के प्रति स्थानीय समाज के भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है।
छत्तीसगढ़ में बस्तर की सांस्कृतिक परंपराएं अपनी विशिष्ट पहचान के लिए जानी जाती हैं। यहां धार्मिक अनुष्ठान केवल पूजा तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समुदाय की मान्यताओं और सामूहिक जीवन से भी जुड़े होते हैं। देवी बास्ताबुंदिन को काला चश्मा चढ़ाने की परंपरा भी इसी सांस्कृतिक विविधता का एक दिलचस्प उदाहरण है।
हालांकि जंगलों को बुरी नजर से बचाने का विश्वास धार्मिक आस्था का विषय है। वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं। इस परंपरा के इतिहास, स्थानीय रीति-रिवाजों और इसके पीछे की मान्यताओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए ग्रामीणों और पुजारियों से बातचीत जरूरी है। बस्तर की यह परंपरा बताती है कि लोकआस्था के अलग-अलग रूप किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को किस तरह खास बनाते हैं।