मुरिया दरबार बस्तर सोर्स : सोशल मीडिया
बस्तर

राष्ट्रपति के दौरे से पहले बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार का नाम बदलने पर मचा बवाल

Bastar Muriya Darbar Controversy : बस्तर में 23 अक्टूबर को राष्ट्रपति के दौरे से ठीक पहले दशहरा की ऐतिहासिक परंपरा 'मुरिया दरबार' का नाम 'आम दरबार' लिखे जाने पर सियासी विवाद गहरा गया है।

जयदास मानिकपुरी, ऐश्वर्या द्विवेदी

Highlights

  • बस्तर दशहरा की सूची में मुरिया दरबार का नाम बदला गया है।

  • इसे बदलकर आम दरबार लिखे जाने से विवाद शुरू हुआ है।

  • 23 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु इस कार्यक्रम में शामिल होंगी।

  • विधायक विक्रम मंडावी ने इस बदलाव पर कड़ी आपत्ति जताई है।

  • आदिवासी समाज ने इसे अपनी परंपरा का अपमान बताया है।

Bastar Dussehra Muriya Darbar Controversy : छत्तीसगढ़ के बस्तर में इन दिनों राजनीति गरमा गई है। दशहरा कार्यक्रम की सूची में एक बड़ा बदलाव किया गया है। ऐतिहासिक मुरिया दरबार की जगह आम दरबार लिखा गया है। यह आयोजन 23 अक्टूबर को होना है। इसी कार्यक्रम में देश की राष्ट्रपति शामिल होने वाली हैं। सूची सामने आते ही सवाल उठने लगे हैं।

आदिवासियों का प्रमुख मंच मुरिया दरबार

मुरिया दरबार बस्तर की एक बहुत पुरानी परंपरा है। यह परंपरा साल 1875 से लगातार चली आ रही है। रियासत काल में राजा के सामने जनता अपनी बात रखती थी। मांझी और पुजारी अपनी समस्याएं राजा को बताते थे। आज भी यह आदिवासियों का एक प्रमुख मंच है।

मुरिया दरबार विवाद

नाम बदलने पर तीखा विरोध

बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने इस बदलाव का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने इसे आदिवासियों की आस्था पर हमला बताया है। विधायक ने कहा कि यह बस्तर की संस्कृति का अपमान है। उन्होंने सरकार से पुराना नाम बहाल करने की मांग की है। मांग पूरी न होने पर आंदोलन की चेतावनी दी गई है।

राष्ट्रपति का दौरा और सियासत

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 23 अक्टूबर को बस्तर पहुंच रही हैं। मुख्यमंत्री ने उनके दौरे की पुष्टि भी कर दी है। ऐसे समय में नाम बदलने का विवाद तूल पकड़ रहा है। एक तरफ राष्ट्रपति का ऐतिहासिक दौरा है। दूसरी तरफ नाम को लेकर नया सियासी संकट खड़ा हो गया है।

1875 से जारी मुरिया दरबार

वर्ष 1875 से चली आ रही 'मुरिया दरबार' बस्तर दशहरा की एक अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा है। राजशाही दौर में इस दरबार का आयोजन किया जाता था, जहाँ बस्तर के राजा के समक्ष मांझी, चालकी, पुजारी और स्थानीय आदिवासी समाज के प्रतिनिधि अपनी समस्याएं और मांगे रखते थे। समय के साथ शासन व्यवस्था बदली, लेकिन यह परंपरा बनी रही। आज भी यह आदिवासियों की लोकतांत्रिक भागीदारी और अपनी बात खुलकर रखने का प्रमुख मंच है।

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