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कंगाल पाकिस्तान की बढ़ी मुश्किलें, कमजोर टैक्स वसूली बनी गले की फांस, IMF ने रोका फंड; अब क्या करेगा पड़ोसी देश?

Pakistan Tax System: आईएमएफ अक्सर इस वित्तीय अंतर को कम करने के लिए बिजली दरें बढ़ाने पर जोर देता रहा है। लेकिन केवल दरें बढ़ाने से उस प्रणाली की समस्या हल नहीं होगी।

मनोज आर्या

Pakistan Economic Crisis 2026: पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के बीच एक अरब डॉलर की किस्त जारी करने को लेकर चल रही बातचीत एक बार फिर ठप पड़ गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसकी वजह मौजूदा बजट की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवाल और टैक्‍स कलेक्‍शन का कम होना है।कराची के अखबार 'बिजनेस रिकॉर्डर' के अनुसार, आईएमएफ ने एक बार फिर पाकिस्तान के टैक्स सिस्टम पर सवाल उठाए हैं। आईएमएफ का कहना है क‍ि राजस्व लक्ष्य हासिल होना मुश्किल दिखाई देता है।

रिपोर्ट के कहा गया है कि यह चिंता जायज है। पाकिस्तान की टैक्स सिस्टम लंबे समय से कमजोर प्रदर्शन करती रही है। देश का टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात 9-10 प्रतिशत के आसपास ही अटका है, जो समान उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सबसे कम है। कर दायरा सीमित है, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी है और कर अनुपालन भी कमजोर है।

टैक्स सिस्टम में सुधार की मांग

दशकों से हर आईएमएफ कार्यक्रम में पाकिस्तान से कर प्रशासन सुधारने, कर आधार बढ़ाने और राजस्व लक्ष्य बढ़ाने की मांग की जाती रही है, लेकिन इन प्रयासों के बावजूद नतीजे सीमित ही रहे हैं। औपचारिक क्षेत्र अभी भी कर का अधिकांश बोझ उठाता है, जबकि संपत्ति के बड़े हिस्से, खासतौर पर खुदरा कारोबार, कृषि और अन्य क्षेत्रों पर बहुत कम कर लगता है या वे पूरी तरह व्यवस्था से बाहर हैं। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, जिसे अक्सर जीडीपी का लगभग 40 प्रतिशत माना जाता है, काफी हद तक कर प्रणाली की पकड़ से बाहर है।

राजस्व भी एक बड़ी समस्या

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की वित्तीय समस्या केवल इतनी नहीं है कि सरकार बहुत कम राजस्व जुटाती है। उतनी ही बड़ी समस्या यह भी है कि सार्वजनिक क्षेत्र में भारी वित्तीय घाटा जारी है और इस पर निर्णायक सुधार नहीं हो पाए हैं। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण घाटे में चलने वाले सार्वजनिक उपक्रमों से होने वाला लगातार नुकसान है। पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (पीआईए) और पाकिस्तान स्टील मिल्स जैसी संस्थाओं ने वर्षों में भारी घाटा जमा किया है। इनकी देनदारियों का बोझ राष्ट्रीय खजाने पर पड़ता है, जिसे सब्सिडी, गारंटी और कर्ज पुनर्गठन के माध्यम से वहन किया जाता है। ये संस्थान मुख्य रूप से इसलिए जीवित हैं क्योंकि सरकारें इनके पुनर्गठन या निजीकरण से जुड़े राजनीतिक जोखिमों का सामना करने से हिचकती हैं। फ‍िर भी इनके वित्तीय नुकसान हर साल सैकड़ों अरब रुपए तक पहुंच जाते हैं, जो चुपचाप सार्वजनिक संसाधनों को खत्म करते रहते हैं।

एनर्जी सेक्टर पर भी बड़ा संकट

रिपोर्ट में आगे लिखा गया है कि, अजीब बात यह है कि जहां आईएमएफ कार्यक्रम राजस्व लक्ष्यों पर बहुत जोर देते हैं, वहीं सार्वजनिक उपक्रमों में सुधार की तत्काल आवश्यकता उतनी मजबूत नहीं दिखाई देती। निजीकरण की योजनाएं धीमी गति से आगे बढ़ती हैं, पुनर्गठन की समय-सीमा बार-बार टलती है और घाटे में चल रही संस्थाओं को सरकारी वित्तीय सहायता मिलती रहती है। पाकिस्तान के ऊर्जा क्षेत्र में एक और बड़ा वित्तीय संकट मौजूद है। देश का सर्कुलर डेब्ट (बिजली व्यवस्था के भीतर बकाया भुगतान की जटिल श्रृंखला) कई लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

बिजली दरें बढ़ाने पर जोर

आईएमएफ अक्सर इस वित्तीय अंतर को कम करने के लिए बिजली दरें बढ़ाने पर जोर देता रहा है। लेकिन केवल दरें बढ़ाने से उस प्रणाली की समस्या हल नहीं होगी जो अक्षमता और कमजोर प्रशासन से ग्रस्त है। बिजली वितरण कंपनियों के गहरे पुनर्गठन और बेहतर प्रबंधन के बिना यह सर्कुलर डेब्ट फिर से बढ़ जाता है।

लेख में यह भी कहा गया कि एक अन्य पहलू जिस पर लगातार पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, वह है गैर-उत्पादक या अत्यधिक सार्वजनिक खर्च। केंद्र और प्रांतीय बजटों में अब भी भारी प्रशासनिक खर्च, गलत तरीके से दी जा रही सब्सिडी और राजनीतिक कारणों से शुरू की गई विकास योजनाएं शामिल हैं, जिनका आर्थिक लाभ सीमित होता है।

लेख के अनुसार, वित्तीय अनुशासन केवल अधिक राजस्व जुटाने से हासिल नहीं हो सकता। इसके लिए यह भी जरूरी है कि सार्वजनिक धन कैसे खर्च किया जा रहा है, इसकी गंभीर समीक्षा की जाए।

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