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Budget 2026: क्या होता है 'लाभ वाला बजट' और भारत इसे क्यों नहीं अपनाता? जानें कौन हैं दुनिया के 'सरप्लस किंग'

What is Surplus Budget: बजट के खेल में सरप्लस यानी बचत और डेफिसिट यानी घाटे का क्या मतलब है? क्यों भारत अपनी कमाई से ज्यादा खर्च करना पसंद करता है। इस खबर से जानिए कौन से देश लाभ वाला बजट बनाते हैं।

प्रतीक पाण्डेय

Surplus Budget vs Deficit Budget: जब सरकार अपनी कमाई से कम खर्च करती है, तो उसे 'लाभ वाला बजट' कहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत जानबूझकर घाटे का बजट चुनता है? आइए इसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. अमित पाण्डेय से आसान भाषा में समझते हैं।

प्रो. अमित के अनुसार जब किसी सरकार की एक साल की कुल कमाई (राजस्व) उसके कुल खर्च से ज्यादा हो जाती है, तो उसे अधिशेष या लाभ वाला बजट (Surplus Budget) कहा जाता है। इसका मतलब है कि सरकार ने अपनी सभी जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद भी पैसा बचा लिया है। हालांकि इसे 'वित्तीय अनुशासन' का प्रतीक माना जाता है, लेकिन यह हमेशा विकास के लिए अच्छा ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है।

सरकार कैसे बचाती है पैसा?

लाभ वाला बजट बनाने के लिए सरकार दो मुख्य रास्तों पर चलती है:

• कमाई बढ़ाना: सरकार टैक्स के दायरे को बढ़ाती है, सरकारी कंपनियों के शेयर बेचती है (विनिवेश) और सेवाओं पर शुल्क या जुर्माना लगाकर फंड जुटाती है।

• खर्चों पर लगाम: सरकार फालतू खर्चों को रोकती है, जैसे सब्सिडी में कटौती करना, सरकारी वेतन-भत्तों को नियंत्रित करना और छोटी योजनाओं को आपस में मिला देना। इसके अलावा, अर्थशास्त्री पहले से अनुमान लगाते हैं कि यदि जीडीपी ग्रोथ अच्छी होगी, तो टैक्स अपने आप ज्यादा आएगा और बचत आसान हो जाएगी।

दुनिया के 'सरप्लस किंग': कौन से देश बचाते हैं पैसा?

दुनिया के ज्यादातर बड़े देश (जैसे भारत और अमेरिका) घाटे का बजट पेश करते हैं, लेकिन कुछ देश पैसा बचाने में माहिर हैं:

बचत के फायदे और नुकसान

फायदे: बजट में पैसा बचने से सरकार पुराने कर्ज चुका सकती है, जिससे ब्याज का बोझ कम होता है। यह पैसा मंदी या महामारी जैसी 'आपात स्थिति' में काम आता है और विदेशी निवेशकों का भरोसा भी बढ़ाता है। नुकसान: अगर सरकार पैसा बचाने के चक्कर में सड़क, रेल या बिजली पर खर्च नहीं करेगी, तो विकास की गति धीमी हो जाएगी। साथ ही, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं में गिरावट आ सकती है और बाजार में मांग कम होने से बेरोजगारी बढ़ सकती है।

भारत क्यों चुनता है 'घाटे का रास्ता'?

भारत की अर्थव्यवस्था एक 'बढ़ते हुए बच्चे' की तरह है जिसे पोषण के लिए ज्यादा निवेश की जरूरत है। भारत 'लाभ वाले बजट' के पीछे इसलिए नहीं भागता क्योंकि: • बुनियादी ढांचे की जरूरत: हमें लाखों किलोमीटर नई सड़कें और आधुनिक रेलवे ट्रैक बनाने हैं। अगर सरकार सिर्फ टैक्स की बचत से काम करेगी, तो विकास में सदियाँ लग जाएंगी। इसलिए सरकार कर्ज लेकर निवेश (Capital Expenditure) करती है। • सामाजिक कल्याण: करोड़ों लोगों को सस्ता राशन (PDS), खाद और गैस सब्सिडी देना जरूरी है। साथ ही सरकारी स्कूल और अस्पतालों के लिए भारी फंड चाहिए होता है। • मल्टीप्लायर इफेक्ट: अर्थशास्त्र का नियम है कि अगर सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर ₹1 खर्च करती है, तो वह अर्थव्यवस्था में ₹2.5 से ₹3 तक का फायदा पहुँचाता है।

भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया: एक तुलना

ऑस्ट्रेलिया एक विकसित देश है जिसकी जनसंख्या कम है और बुनियादी ढांचा तैयार है, इसलिए वह पैसा बचाता है। इसके विपरीत, भारत को अभी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है और करोड़ों युवाओं को रोजगार देना है। हमारे लिए पैसा बचाने से ज्यादा जरूरी उसे सही जगह निवेश करना है।

भारत का लक्ष्य अपने घाटे को जीडीपी के 4.5% से 5% के बीच रखना है, ताकि विकास भी न रुके और महंगाई भी न बढ़े। भविष्य में जब भारत 'विकसित राष्ट्र' बन जाएगा, तब हम भी लाभ वाले बजट की ओर बढ़ सकते हैं। फिलहाल, हमारे लिए "सार्थक घाटा" ही तरक्की का असली ईंधन है।

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