

Highlights:
ट्रंप की पार्टी की हार से पाकिस्तान की व्हाइट हाउस तक सीधी पहुंच कमजोर होने का खतरा।
असीम मुनीर ने ट्रंप प्रशासन से रिश्ते मजबूत करने में निभाई अहम भूमिका।
ट्रंप के करीबियों से जुड़े क्रिप्टो, होटल और ड्रोन सौदे अमेरिकी कांग्रेस की जांच के दायरे में।
Donald Trump Defeat What Impact on Pakistan: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगा है। इस नतीजे का असर अब पाकिस्तान की राजनीति और कूटनीति पर भी पड़ सकता है। दरअसल, पाकिस्तान ने पिछले करीब दो वर्षों में ट्रंप प्रशासन के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने के लिए काफी कोशिशें की हैं। पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व ने ट्रंप को साधने के लिए कई कूटनीतिक पहल कीं। लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की ताकत बढ़ने से अब इस्लामाबाद की व्हाइट हाउस तक सीधी पहुंच कमजोर पड़ने की आशंका है।
पाकिस्तान के नेताओं के लिए यह नतीजा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने अपनी विदेश नीति का बड़ा हिस्सा ट्रंप प्रशासन के साथ करीबी रिश्तों पर केंद्रित कर दिया था। हालांकि, आम पाकिस्तानी नागरिक इन चुनावी नतीजों को अलग नजरिए से देख रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका की राजनीति में बदलाव से ईरान युद्ध का असर कम होगा और देश में महंगाई से कुछ राहत मिल सकती है।
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के युद्ध ने पाकिस्तान की आर्थिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं। करीब 24 करोड़ की आबादी वाला पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर आम परिवारों पर पड़ रहा है।
कराची के रहने वाले सज्जाद अली ने रॉयटर्स से बातचीत में कहा कि मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के साथ सार्थक बातचीत की उम्मीद कम है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को शांति, आर्थिक सुधार और तेल की कीमतों में कमी की जरूरत है।
वहीं, कराची के ही आसिम जफर को उम्मीद है कि चुनावी नतीजों से ट्रंप पर लगाम लगेगी और मुस्लिम देशों के खिलाफ होने वाली नीतियों में कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है।
विश्लेषकों के मुताबिक, पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए अमेरिकी चुनाव के नतीजे आम लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशें तेज कर दी थीं।
इसमें पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की अहम भूमिका रही। जून 2025 में मुनीर ने व्हाइट हाउस में ट्रंप के साथ लंच किया था। इस बैठक में पाकिस्तान के नागरिक अधिकारी मौजूद नहीं थे। इससे साफ हुआ कि अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत करने में पाकिस्तानी सेना सबसे आगे थी।
पाकिस्तानी सेना के मुताबिक, दोनों देशों के बीच बातचीत केवल सुरक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें खनन, ऊर्जा और क्रिप्टोकरेंसी जैसे क्षेत्र भी शामिल थे।
इसके बाद पाकिस्तान ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल हुआ और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया। मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य संघर्ष को खत्म कराने में ट्रंप की भूमिका को भी इस्लामाबाद ने स्वीकार किया, जबकि भारत अमेरिकी मध्यस्थता के दावे से इनकार करता है।
ईरान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच संदेश पहुंचाने और बातचीत कराने में भूमिका निभाई। अप्रैल में इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच वार्ता भी हुई, हालांकि प्रस्तावित समझौता ज्यादा समय तक नहीं टिक सका।
इसके बावजूद पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था के लिए कोई बड़ी राहत नहीं मिली। दिसंबर 2025 में अमेरिकी एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक ने रेको डिक कॉपर और गोल्ड परियोजना के लिए 1.25 अरब डॉलर की मंजूरी दी थी। लेकिन अमेरिकी ट्रेजरी से 10 अरब डॉलर की सुविधा हासिल करने की पाकिस्तान की प्रमुख मांग पर कोई स्पष्ट फैसला नहीं हुआ।
पाकिस्तान की मुश्किलें केवल कूटनीतिक नहीं हैं। ट्रंप के परिवार और उनके करीबी सहयोगियों से जुड़े कारोबारी समझौते भी अब जांच के दायरे में हैं।
इस्लामाबाद ने ट्रंप से जुड़ी कंपनी वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल के USD1 स्टेबलकॉइन के जरिए भुगतान की संभावनाएं तलाशने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा, मैनहट्टन स्थित रूजवेल्ट होटल के पुनर्विकास और ड्रोन कंपनी पावरस से सीमित खरीद का समझौता भी हुआ है। पावरस के निवेशकों में ट्रंप के बेटे डोनाल्ड जूनियर और एरिक शामिल हैं।
पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी का मानना है कि ट्रंप की टीम के साथ इस्लामाबाद ने लेन-देन पर आधारित रिश्ता बनाया था। उनके मुताबिक, राष्ट्रपति के करीबी लोगों से जुड़े कुछ समझौते अमेरिकी राजनीतिक बदलाव के बाद टिक नहीं पाएंगे।
वहीं, अटलांटिक काउंसिल के माइकल कुगेलमैन का कहना है कि पाकिस्तान के पास आतंकवाद विरोधी सहयोग और ईरान से जुड़े कूटनीतिक प्रयासों के रूप में कुछ मजबूत आधार अब भी मौजूद हैं। इन मुद्दों पर अमेरिका के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन है।
हालांकि, पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि उसने अपनी कूटनीति को काफी हद तक ट्रंप और व्हाइट हाउस पर निर्भर कर दिया है। अब अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की बढ़ती ताकत के बीच इस्लामाबाद को वाशिंगटन में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए नई रणनीति बनानी पड़ सकती है।