महिलाओं को पीटना घरेलू हिंसा नहीं...बस टूटनी नहीं चाहिए हड्डी, तालिबान का आया नया फरमान

Taliban on Womens Domestic Violence: तालिबान ने नई दंड संहिता लागू की, जिसमें महिलाओं पर घरेलू हिंसा की अनुमति है, सामाजिक वर्ग के आधार पर दंड तय होता है, और महिलाओं को न्याय पाना कठिन होगा।
Taliban on Womens Domestic Violence
अफगानिस्तानी महिलाएं (सोर्स- सोशल मीडिया)
Published on
Updated on

Taliban New Rules against Woman: तालिबान ने महिलाओं और पत्नियों के खिलाफ घरेलू हिंसा को वैध ठहराने वाला नया कानून पेश किया है। इसके अनुसार, पति अपनी पत्नी को मार-पीट सकते हैं, बशर्ते उनकी हड्डियां न टूटें और कोई गंभीर चोट न लगे। इस कानून ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सनसनी मचा दी है, क्योंकि यह महिलाओं की सुरक्षा के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।

तालिबान की नई दंड संहिता हिबतुल्लाह अखुंदजादा द्वारा समर्थित है। इस कानून के तहत पतियों को अपनी पत्नियों और बच्चों को शारीरिक रूप से दंडित करने की अनुमति दी गई है। संहिता अपराधियों को उनकी सामाजिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग दंड देती है। धार्मिक विद्वान, कुलीन वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है।

महिला को अदालत में दिखानी होंगी अपनी चोटें

तालिबानी सरकार के नई संहिता के तहत महिलाओं को जज के सामने अपनी चोटें दिखाना आवश्यक है। इसके साथ ही, पति या किसी पुरुष साथी का भी अदालत में मौजूद होना अनिवार्य है। इस कानून में महिलाओं पर अत्यधिक दबाव डालने की व्यवस्था की गई है, जिससे उन्हें न्याय पाना कठिन हो जाएगा।

दंड का सामाजिक वर्ग पर आधारित अंतर

अनुच्छेद 9 के तहत अपराध के लिए दंड मुख्य रूप से अपराध की गंभीरता पर नहीं, बल्कि आरोपी की सामाजिक स्थिति पर तय होता है। उदाहरण के लिए, धार्मिक विद्वान को केवल सलाह दी जाती है, कुलीन वर्ग के लिए अदालत में बुलाकर सलाह दी जाती है, मध्यम वर्ग के लिए जेल होती है, और निम्न वर्ग के लोगों को जेल के साथ शारीरिक दंड भी हो सकता है। गंभीर मामलों में दंड इस्लामी धर्मगुरुओं द्वारा दिया जाएगा, न कि सुधार सेवाओं द्वारा।

महिलाओं पर नियंत्रण और प्रतिबंध

नई 90-पृष्ठीय दंड संहिता ने 2009 के EVAW कानून को समाप्त कर दिया है, जो महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए बनाया गया था। इसके अनुसार, अगर कोई महिला अपने पति की अनुमति के बिना रिश्तेदारों से मिलती है, तो उसे तीन महीने तक जेल हो सकती है। दुनियाभर के मानवाधिकार समूहों का कहना है कि लोग इस संहिता के खिलाफ बोलने से डरते हैं, क्योंकि इसके खिलाफ चर्चा करना भी अपराध माना गया है।

Navbharat Live
navbharatlive.com