

Heat havoc in Europe: भारत के कई राज्यों में अभी भीषण गर्मी पड़ रही है, तापमान हर दिन 50 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच रहा है। हालांकि भारत में रहने वाले लोगों के लिए ऐसी भयानक गर्मी कोई नई बात नहीं है। लेकिन इसी गर्मी ने यूरोप में कहर ढा रखा है। पूरा यूरोप इस समय भीषण हीटवेव की चपेट में है, जिससे अब तक 1,300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
यूरोप में गर्मी का कहर इतना भयंकर है कि, सड़कें पिघल रही हैं और रेलवे ट्रैक उखड़ रहे हैं, स्कूल और दफ्तरों को बंदकर दिया गया है और लोगों घरों को छोड़कर बाहर समुद्र किनारे रातें गुजारने को मजबूर हो गए हैं। ऐसे में सवाल आता है कि जो गर्मी भारत के लिए सामान्य है वो यूरोप में इतनी खतरनाक कैसे हो गई? यूरोप में इस भीषण गर्मी के पीछे क्या कारण है?
यूरोप में गर्मी के सारे पुराने रिकॉर्ड टूट चुके हैं-
भारत में 35-40 डिग्री तापमान सामान्य माना जाता है। जबकि यही गर्मी यूरोप के लिए जानलेवा साबित हो रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है भारत और यूरोप की भौगोलिक स्थिति। भारत से कर्क रेखा होकर गुजरती है, यहां सूरज की रोशनी सीधी और अधिक समय तक पड़ती है। जिसके चलते भारत में भीषण गर्मी पड़ती है।
वहीं, यूरोप से आर्कटिक वृत्त और प्रधान मध्याह्न रेखा गुजरती है। जहां सूरज की किरणें तिरछी पड़ती हैं, जिससे ऊष्मा और तापमान कम होता है। इसके कारण यूरोप में सामान्य रूप से गर्मी से अधिक सर्दी रहती है। यही कारण है कि भारत में जिस तापमान को सामान्य माना जाता है, वही यूरोप के लिए खतरनाक और जानलेवा बन जाती है।
यूरोप में गर्मी के जानलेवा साबित होने के पीछे कई कारण हैं। जैसे यूरोपीय घरों की बनावट, एयर कंडीशनर की कमी और बुजुर्ग आबादी।
घरों की संरचना: यूरोप में क्योंकि गर्मी से अधिक ठंड होती है ऐसे में यहां के घरों को इस प्रकार से बनाया जाता है ताकि वो लंबे समय तक अंदर से गर्म रहे। वहां की दीवारें और छतें (अक्सर टिन या लोहे की) गर्मी को अंदर सोख लेती हैं और उसे बाहर नहीं निकलने देतीं। यह ठंड के मौसम के लिए तो सही है लेकिन गर्मी के लिए यह जानलेवा बन जाता है।
आराम की कमी: अत्यधिक गर्मी के कारण यूरोप के घर रात में 'भट्टी' की तरह गर्म हो रहे हैं। जिससे लोगों के शरीर को गर्मी से उबरने का मौका नहीं मिल पा रहा है। नतीजतन हीट स्ट्रोक, हीट एग्जॉस्टशन, कार्डियोवैस्कुलर और डिहाइड्रेशन जैसे चीजें हो रही है। जिससे लोगों की मौत हो रही है।
एयर कंडीशनर की कमी: यूरोप में अमेरिका की तुलना में 90 प्रतिशत घरों में एयर कंडीशनर सिस्टम नहीं है। पूरे यूरोप में केवल 20% घरों में ही AC है। जबकि ब्रिटेन में यह आंकड़ा केवल 7 प्रतिशत है। यहां तक कि यूरोप के सार्वजनिक स्थानों, स्कूलों और अस्पतालों तक में AC नहीं है। हालांकि, फ्रांस में अब सरकार ने अस्पतालों में AC लगाने के लिए 100 करोड़ यूरो का बजट जारी किया है। यह कदम एक मरीज के कमरे में अधिक गर्मी होने के कारण मौत हो जाने के बाद लिया गया है।
बुजुर्ग आबादी: यूरोप में गर्मी से होने वाली मौतों में एक बड़ी संख्या बुजुर्गों की है। यूरोप में 22% आबादी 65 वर्ष से अधिक उम्र की है, जिनके लिए इस प्रकार की गर्मी को बर्दाश्त करना काफी मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा अधिकतर बुजुर्ग अकेले रहते हैं। उनका ख्याल रखने के लिए उनके पास कोई नहीं होता। इसके अलावा यूरोप में भारत (12-13 घंटे) की तुलना में सूरज की रोशनी अधिक समय (लगभग 16 घंटे) तक रहती है, जिससे गर्मी की तीव्रता और बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस भीषण गर्मी के पीछे तीन प्रमुख वैज्ञानिक कारण हैं-
ओमेगा ब्लॉक: यूरोप के वायुमंडल में एक हाई-प्रेशर सिस्टम बना हुआ है, जिसके दोनों तरफ लो-प्रेशर सिस्टम हैं। इसके कारण मौसम को आगे बढ़ाने वाली 'जेट स्ट्रीम' ग्रीक अक्षर Ω (ओमेगा) के आकार में बह रही है। यह एक 'मौसमी ट्रैफिक जाम' की तरह काम कर रहा है, जिसने अफ्रीका से आने वाली गर्म हवाओं को यूरोप में कैद कर लिया है और ठंडी हवाओं को अंदर आने से रोक दिया है।
हीट डोम: जब हाई-प्रेशर सिस्टम एक जगह स्थिर हो जाता है, तो वह सूरज की गर्मी से ऊपर उठने वाली हवा को वापस नीचे धकेलता है। जैसे-जैसे हवा नीचे दबती है, वह संकुचित होकर और अधिक गर्म हो जाती है। यह प्रेशर कुकर जैसा माहौल पैदा कर देता है, जिसमें बादलों के अभाव में सूरज की सीधी किरणें जमीन को और ज्यादा तपाती हैं।
ग्लोबल वॉर्मिंग: वैज्ञानिक मानते हैं कि ओमेगा ब्लॉक और हीट डोम जैसी प्राकृतिक घटनाएं ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण अधिक तीव्रता के साथ हो रही हैं। यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन गया है और यह वैश्विक औसत से दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है।
सामान्य शब्दों में कहे तो यूरोप में पड़ी रही गर्मी सिर्फ अधिक तापमान का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे भौगोलिक स्थिति, जलवायु, घरों की संरचना, एयर कंडीशनर की कमी, बुजुर्ग आबादी के साथ ओमेगा ब्लॉक, हीट डोम और ग्लोबल वॉर्मिंग जैसे वैज्ञानिक कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।
यूरोप की जलवायु और बुनियादी ढांचा ऐसे तापमान के अनुकूल नहीं हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण आने वाले समय में ऐसी घटनाएं बढ़ सकती है। इसलिए समय रहते जलवायु नीतियां, बेहतर शहरी नियोजन और हीटवेव से बचाव के उपाय अपनाना बेहद जरूरी है।