

BSP Uttar Pradesh elections 2027: यूपी की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर अपने पुराने ‘सर्वसमाज’ और सामाजिक इंजीनियरिंग के फॉर्मूले की ओर लौटती दिखाई दे रही है। मायावती ने एक पोस्ट कर आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों, उम्मीदवारों के चयन और पार्टी के विधानसभा स्तर के सम्मेलनों में नामों की घोषणा का जिक्र किया है। खास तौर पर ब्राह्मण समाज को लेकर पार्टी की सक्रियता ने 2007 के विधानसभा चुनाव की यादें ताजा कर दी हैं।
सवाल यह है कि 2007 में ऐसा क्या हुआ था, जिसने BSP को उत्तर प्रदेश में अपने दम पर बहुमत तक पहुंचा दिया था?
2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में BSP ने 403 सीटों पर चुनाव लड़ा और लगभग 30 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। यह पार्टी का अब तक का सबसे बड़ा विधानसभा प्रदर्शन रहा है।
उस विधानसभा चुनाव में BSP ने ऊंची जातियों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर खास जोर दिया। बसपा ने कुल 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इसके अलावा ठाकुर, वैश्य समेत अन्य सवर्ण समुदायों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया। उस वक्त BSP की सूची में 139 उम्मीदवार ऊंची जातियों से थे, जिनमें 86 ब्राह्मण थे।
यही वह दौर था जब मायावती ने सतीश चंद्र मिश्र को BSP के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के तौर पर आगे किया और प्रदेशभर में ब्राह्मण-दलित ‘भाईचारा’ सम्मेलनों के जरिए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश हुई।
2007 की सफलता सिर्फ उम्मीदवारों की जातीय संख्या से नहीं समझी जा सकती है। CSDS के चुनाव अध्ययन के अनुसार 2007 में ब्राह्मण मतदाताओं में BSP का समर्थन सीमित था, जबकि दलित खासकर जाटव मतदाताओं में BSP का समर्थन बेहद मजबूत था। अध्ययन में जाटव मतदाताओं के बीच BSP का समर्थन लगभग 86 प्रतिशत दर्ज किया गया। वहीं गैर-जाटव दलित और कुछ गैर-यादव OBC समूहों में भी BSP को खूब समर्थन मिला।
यानी 2007 की रणनीति का केंद्र यह था कि BSP का मजबूत दलित आधार बना रहे और उसके ऊपर ब्राह्मण, अन्य सवर्ण, OBC तथा कुछ मुस्लिम वोटों की अतिरिक्त परत जोड़ी जाए।
इसी सामाजिक गठजोड़ को राजनीतिक विश्लेषकों ने मायावती की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के तौर पर देखा।
2007 के चुनावी प्रयोग का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि BSP ने केवल ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिश नहीं की, बल्कि बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा।
इससे पार्टी ने कई सीटों पर स्थानीय स्तर पर नए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश की और सफलता भी मिली।
2007 के बाद यह प्रयोग हमेशा उसी ताकत के साथ कायम नहीं रह सका। 2012 में BSP सत्ता से बाहर हुई और 2017 में पार्टी की सीटों की संख्या और कम हो गई। बाद के चुनावों में ब्राह्मण उम्मीदवारों की संख्या और उनकी सफलता भी 2007 के स्तर पर नहीं रही। ब्राह्मण उम्मीदवारों की बात करें तो 2012 के चुनाव में 51 में 7 और 2017 में 52 में केवल 4 उम्मीदवार जीते।
इससे एक बात साफ होती है, 2007 का ब्राह्मण-दलित समीकरण सिर्फ टिकट बांटने का मामला नहीं था; उसके पीछे संगठन, स्थानीय नेतृत्व, भाईचारा सम्मेलन और चुनावी सीटों के हिसाब से उम्मीदवारों का चयन भी था।
मायावती के हालिया पोस्ट में जिस तरह उम्मीदवारों के चयन, नामों की घोषणा और विधानसभा स्तर के सम्मेलनों की बात कही गई है, उससे यह संकेत मिलता है कि BSP चुनाव से काफी पहले अपना संगठनात्मक और उम्मीदवार चयन का काम शुरू करना चाहती है।
ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या BSP 2007 की तरह दलित आधार के साथ ब्राह्मण और दूसरे सवर्ण वर्गों को जोड़कर व्यापक सामाजिक गठबंधन फिर खड़ा कर पाएगी?
दूसरा सवाल उम्मीदवारों का होगा। 2007 में 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देना अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश भी था। इस बार BSP कितने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारती है, किन सीटों पर उतारती है और क्या उन उम्मीदवारों के साथ पार्टी का पारंपरिक दलित वोट ट्रांसफर होगा। यही आने वाले चुनावी समीकरण को समझने की कुंजी हो सकती है।
मायावती के पोस्ट में बसपा के वरिष्ठ नेता और पार्टी के साथ लंबे समय से जुड़े सतीश चंद्र मिश्र को चुनाव आयोग से जुड़े कार्यों के साथ महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने का भी उल्लेख है। यह पोस्ट 2007 के उस दौर की याद दिलाता है, जब सतीश चंद्र मिश्र BSP के ब्राह्मण आउट रिच के प्रमुख चेहरों में शामिल थे।
वर्ष 2007 ने साबित किया था कि उत्तर प्रदेश में चुनाव केवल जातीय संख्या का खेल नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच वोट ट्रांसफर और उम्मीदवार चयन की राजनीति भी है। अब 2027 में मायावती के सामने चुनौती सिर्फ 2007 के फॉर्मूले को दोहराने की नहीं है, बल्कि बदले हुए राजनीतिक माहौल में उसका नया अध्याय तैयार करने की है।
(नवभारत लाइव के लिए प्रत्युष सिंह की रिपोर्ट)