

UP Fire Service Vacancies And Promotion: आग लगने की सूचना मिलते ही सबसे पहले जिस विभाग से लोगों की उम्मीद जुड़ती है, वह है उत्तर प्रदेश अग्निशमन एवं आपात सेवा विभाग। इस विभाग की एक-एक मिनट की तत्परता किसी परिवार की जिंदगी बचा सकती है। लेकिन विडंबना यह है कि दूसरों की जान बचाने वाला यही विभाग इस समय अपने ही तंत्र की गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है।
प्रदेश में लगातार बहुमंजिला इमारतों, अस्पतालों, फैक्ट्रियों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में आग की घटनाएं सामने आ रही हैं। हाल के वर्षों में कई बड़े अग्निकांडों ने यह साबित किया है कि मजबूत फायर सर्विस किसी भी शहर की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था है। ऐसे में यदि विभाग के पास पर्याप्त कर्मचारी ही न हों और वर्षों से पदोन्नति की व्यवस्था ठप पड़ी हो, तो यह केवल कर्मचारियों का नहीं बल्कि आम जनता की सुरक्षा का भी सवाल बन जाता है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार सेवा नियमावली लंबित होने के कारण पिछले चार वर्षों से न तो नियमित पदोन्नति हो सकी है और न ही नई भर्तियां हो पाई हैं। हालत यह है कि जो कर्मचारी फायरमैन या लीडिंग फायरमैन के पद पर भर्ती हुए थे, उनमें से कई उसी पद से सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जबकि उनके साथ भर्ती हुए अन्य विभागों के कर्मचारी निरीक्षक और क्षेत्राधिकारी (CO) जैसे पदों तक पहुंच चुके हैं।
स्थिति केवल पदोन्नति तक सीमित नहीं है। विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी भी चिंता का विषय बनी हुई है। सूत्रों के मुताबिक फायरमैन के 36%, लीडिंग फायरमैन के 63%, फायर सर्विस चालक के 42%, अग्निशमन द्वितीय अधिकारी के 68% तथा अग्निशमन अधिकारी के 91% पद रिक्त हैं। ऐसे संवेदनशील विभाग में इतनी बड़ी संख्या में खाली पद आपदा प्रबंधन की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
बताया जाता है कि तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (फायर सर्विस) सुजीत पांडे ने भी 2 अप्रैल 2026 और 26 जून 2026 को प्रमुख सचिव (गृह) को पत्र भेजकर विभाग में पदोन्नति, रिक्त पदों और सेवा नियमावली से जुड़ी समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया था। हालांकि विभागीय सूत्रों का दावा है कि अब तक इस दिशा में कोई ठोस प्रगति दिखाई नहीं दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक उपकरणों के साथ-साथ प्रशिक्षित और पर्याप्त संख्या में उपलब्ध मानव संसाधन ही किसी भी अग्निशमन सेवा की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। यदि समय रहते रिक्त पद नहीं भरे गए और पदोन्नति की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई, तो भविष्य में किसी बड़ी आपदा के दौरान इसका सीधा असर राहत एवं बचाव कार्यों पर पड़ सकता है।
अब सवाल यह है कि क्या सरकार और संबंधित विभाग इस 'साइलेंट क्राइसिस' को गंभीरता से लेंगे, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद ही व्यवस्था जागेगी?