

Brain Computer Reading Technology: कल्पना कीजिए कि आपको कोई मैसेज टाइप करने की जरूरत ही न पड़े और जो बात आप सिर्फ सोच रहे हों वही सीधे स्क्रीन पर लिखी हुई दिखाई दे। सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगता है लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया अब इसे हकीकत में बदलने की तैयारी कर रही है। बता दें कि अमेरिकी AI स्टार्टअप Conduit ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है जो इंसानी विचारों को सीधे टेक्स्ट में बदल सकते है। वहीं इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि कंपनी इस तकनीक को बेहतर बनाने के लिए लोगों के ब्रेन डेटा के बदले उन्हें करीब 5,200 रुपए तक का भुगतान भी कर रही है।
जानकारी के लिए बता दें कि Conduit का लक्ष्य एक ऐसा AI मॉडल तैयार करना है जो इंसान के सोचने और स्क्रीन पर टेक्स्ट दिखने के बीच की दूरी को खत्म कर देगा। वहीं इस प्रोजेक्ट से जुड़ी रिसर्चर नाओमी बाशकांस्की के मुताबिक, टीम नॉन-इन्वेंसिव न्यूरल डेटा की मदद से थॉट-टू-टेक्स्ट मॉडल तैयार कर रही है। जिसका सीधा मतलब है कि इसमें दिमाग के अंदर कोई चिप लगाने या सर्जरी की जरूरत नहीं होगी। कंपनी को इस मॉडल की ट्रेनिंग के लिए बड़ी मात्रा में ब्रेन डेटा चाहिए। इसी वजह से आम लोगों को रिसर्च में हिस्सा लेने का मौका दिया जा रहा है ताकि अलग-अलग तरह के न्यूरल सिग्नल रिकॉर्ड किए जा सकें।
इस रिसर्च में भाग लेने वाले लोगों को कंपनी के ऑफिस जाकर लगभग 2 किलोग्राम वजन वाला इलेक्ट्रोड से लैस हेलमेट पहनना होगा। इसके बाद करीब दो घंटे तक AI से बातचीत करनी होगी या टाइपिंग करनी होगी। इसके बदले कंपनी करीब 5,200 रुपए का भुगतान कर रही है। लेकिन इसमें शामिल होने के लिए एक शर्त भी रखी गई है प्रतिभागी को बिना कीबोर्ड देखे टाइपिंग करना आना चाहिए। एक व्यक्ति अधिकतम 32 सेशंस में हिस्सा ले सकता है। वहीं अभी के लिए यह कार्यक्रम केवल अमेरिका में उपलब्ध है।
ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस की इस रेस में Conduit अकेला नहीं है। हाल ही में Meta ने अपना Brain2Qwerty सिस्टम पेश किया जो ब्रेन स्कैन को टेक्स्ट में बदलने की क्षमता रखता है। वहीं एलन मस्क की Neuralink पहले ही चिप इम्प्लांट की मदद से कुछ मरीजों को सिर्फ सोच के जरिए टाइपिंग और गेम खेलने में सक्षम बना चुकी है। वहीं इसको लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि Conduit बिना सर्जरी वाली इस तकनीक को सफल बना लेता है तो भविष्य में यह न सिर्फ दिव्यांग और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है बल्कि इंसान और मशीन के बीच संवाद का तरीका भी पूरी तरह बदल सकती है।