

सुधीर शुक्ला@नवभारत
मुंबई: लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन होती है, पार्टी, उम्मीदवार और अन्य समीकरण की बात राजनीति का खेल होता है। नवभारत ने उत्तर मुंबई लोकसभा सीट को लेकर आम जनता क्या सोचती है इसको जानने और समझने की कोशिश की है। हालांकि इसके साथ ही उत्तर मुंबई की लोकसभा का गणित जानना भी बेहद जरूरी है। अब तक हुए लोकसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस पार्टी महज 5 बार चुनाव जीत सकी है। इसके अलावा इस सीट पर बीजेपी और जनता पार्टी का कब्ज़ा रहा है। आइये जानते हैं आम जनता की राय इस बार क्या है।
पीयूष गोयल को इस बार मिला है मौका
1977 के लोकसभा चुनाव में मृणाल गोरे ने जनता पार्टी की तरफ से जीत का परचम लहराया था। 1984 में पीएम इंदिरा गांधी की मौत के बाद सहानुभूति की लहर में कांग्रेस प्रत्याशी अनूप चंद शाह यहां से जीत हासिल कर सके थे। मगर 1988 के बाद पेट्रोलियम मिनिस्टर रह चुके और यूपी के पूर्व राज्यपाल राम नाईक का इस सीट पर दबदबा रहा। विरार बॉय के नाम से मशहूर फिल्म अभिनेता गोविंदा ने 2004 राम नाईक के विजय रथ पर रोक लगाई थी। हालांकि उसके बाद 2009 में कांग्रेस के जुझारू नेता संजय निरुपम ने एक बार फिर से बीजेपी के इस गढ़ में सेंध लगाई। मगर 2014 के लोकसभा चुनाव में उस समय के स्थानीय विधायक गोपाल शेट्टी को मौका दिया गया। जमीनी पकड़ रखने वाले शेट्टी ने पहले निरुपम फिर फिल्म अभिनेत्री उर्मिला को रिकॉर्ड मतों से पराजित किया था। जिसके बाद बीजेपी का ये किला और मजबूत हो गया, लेकिन इस बार बीजेपी ने यहां से पीयूष गोयल को उमीदवार बनाया है।
पियूष गोयल की उम्मीदवारी से निराशा
प्रदीप सोनी (स्थानीय बोरीवली) ने बताया, मै यहाँ का आम मतदाता हूँ। मेरा जन्म ही बोरीवली में हुआ है। पीयूष गोयल की घोषणा मेरे लिहाज से ठीक नहीं है। अगर यहां का कोई स्थानीय उम्मीदवार होता तो हमारे लिए ज्यादा बेहतर होता। हमें मोदी को वोट करना है। मगर इस घोषणा से निराशा जरूर हुई है।
पीयूष गोयल से तेज विकास की उम्मीद
सुजीत उपाध्याय (स्थानीय वोटर) ने कहा, पीयूष गोयल के उम्मीदवारी की घोषणा उनके 35 साल के काम खासकर 2014 से देश के प्रति किये गए उनके समर्पित कार्य का नतीजा है। गोयल के रूप में जनता को एक दूरगामी सोच रखने वाला एक बड़ा नेता मिल रहा है। जो हमेशा सकारात्मक सोच रखते हैं। इस सीट का प्रोफाइल भी उनकी वजह से बढ़ा है। उत्तर मुंबई लोकसभा सीट का और तेजी से विकास की हम उम्मीद रखते हैं।
पीयूष के जीत की कोशिश
प्रशांत पुजारी (उप जिलाध्यक्ष, बीजेपी) के मुताबिक, केंद्र सरकार ने उनकी उम्मीदवारी की घोषणा कुछ सोच कर के ही किया है। हम जमीनी कार्यकर्ता है। हम उनका स्वागत करते हैं। उनकी बड़ी जीत के लिए पूरी कोशिश करेंगे।
मुश्किल है गोयल की जीत
माता चरण यादव (स्थानीय वोटर) ने कहा, पीयूष गोयल मुंबई के लिए नए नहीं हैं। मगर उनकी उम्मेदवारी की घोषणा से ये साफ़ है कि बीजेपी उनको सेफ सीट से उतारकर उनकी जीत पक्की कर रही है। उनके जैसे कद के नेता को मुश्किल सीट से खड़ा होकर जीत दर्ज करनी चाहिए। इस बार यहां से बीजेपी की जीत मुश्किल लग रही है। जिसके बड़ी वजह बीजेपी पार्टी का लोकल आन्तरिक कलह है।
इस सीट पर युति के हैं 5 विधायक
उत्तर मुंबई लोकसभा सीट में 6 विधायक हैं। जिसमे मालवणी विधानसभा को छोड़ दें तो बीजेपी और शिवसेना के पांच विधायक इस सीट पर अपना कब्ज़ा बनाए हुए हैं। इसके इतर लगभग 70 फीसदी बीजेपी और शिवसेना के पार्षद भी यहां से चुनाव जीत कर आते हैं। उत्तर मुंबई लोक सभा सीट में सबसे ज्यादा मराठी मतदाता हैं। उसके बाद गुजराती मतदाताओं की संख्या है। 2014 लोक सभा चुनाव के बाद से तीसरी सबसे बड़ी तादाद के उत्तर भारतीय मतदाता की है जो बीजेपी के पक्के वोटर बन गए हैं। इसलिए ये सीट बीजेपी के लिए राज्य की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक है।
राजनीतिक समीकरण
उत्तर मुंबई लोक सभा सीट में सबसे ज्यादा 32 फीसदी मराठी वोट बैंक है। जबकि गुजराती और राजस्थानी वोट का प्रतिशत 22 फीसदी है। उत्तर भारतीय मतदाता तकरीबन 20 फीसदी के साथ तीसरे नंबर पर हैं। इसी तरह साउथ इंडियन 7 फीसदी, जबकि मुस्लिम वोटरों की तादाद 9 फीसदी है, सिंधी और जैन जैसे अन्य समाज वर्ग के 2 फीसदी के लगभग मतदाता है।
जीत हार का दांवपेंच
आज की तारीख के समीकरण की बात करें तो गुजराती, मारवाड़ी और उत्तर भारतीय मतदाता मजबूती से बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है। मराठी वोटबैंक पर आज भी उद्धव का असर बाला साहेब ठाकरे की वजह से है, लेकिन मोदी फैक्टर मराठी वोट बैंक में भी अच्छी खासी सेंधमारी लोकसभा के चुनाव में करती है। जबकि मुस्लिम वोटर्स आघाड़ी के साथ जुड़ा हुआ है। बीजेपी के लिए ये किला बचाना तब मुश्किल होगा। जब मराठी वोट बीजेपी के साथ छोड़ दे। साथ ही उत्तर भारतीय मतदाता और मुस्लिम मतदाता और कांग्रेस का वोट बैंक उसके साथ जुड़ा रहे। मनसे ने एक लाख से ज्यादा वोट ले लिए थे। 2004 के चुनाव में राम नाईक इसी समीकरण की वजह से चुनाव हार गए थे। निरुपम के वक्त 09 में भी कमोबेश यही समीकरण काम कर गया था। जिसकी वजह से राम नाईक दोबारा यहाँ से चुनाव हार गए थे।
मराठी वोटर्स को भुनाना अघाड़ी की कोशिश
ऐसे में अघाड़ी की कोशिश है कि आधे मराठी वोटर्स मुस्लिम वोटर्स के साथ अगर कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक कहे जाने वाले उत्तर भारतीय मतदाताओं का उन्हें साथ मिला तो वो इस लड़ाई को रोचक बना सकते हैं। पिछले दो लोकसभा चुनावों के नतीजे पर नज़र रखेंगे तो साफ़ होगा कि उत्तर भारतीय वोट बीजेपी के साथ मजबूती के साथ खड़ा है। ऐसे में जमीनी रुझान देखते हुए इसकी गुंजाइश बहुत कम दिखती है।