

ब्रिटेन में भारतीय छात्रों समेत अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की जांच सख्त, वीजा नियमों के उल्लंघन पर सरकार की नजर।
अवैध कामकाज और छात्र वीजा पर निर्धारित घंटों से ज्यादा काम करने वालों पर शिकंजा कसने की तैयारी।
नियमों का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं पर प्रति कर्मचारी 60,000 पाउंड तक जुर्माने का प्रावधान।
सख्त वीजा नियमों, महंगी रिहाइश और रोजगार की चुनौतियों के बीच ब्रिटेन के करीब 76% विश्वविद्यालयों में भारतीय छात्रों की प्रवेश अर्जियां घटने की खबर।
Indian Students UK Visa Checks: ब्रिटेन में डेढ़ लाख से भी अधिक भारतीय छात्र हैं जो वहां ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, लीड्स, साउथैम्पटन, मैनचेस्टर तथा अन्य विश्वविद्यालयों के अलावा कम ख्याति वाली यूनिवर्सिटी व कॉलेजों में पढ़ते हैं। कितने ही छात्र विभिन्न संस्थानों में इंजीनियरिंग, व्यवस्थापन, सीए आदि की पढ़ाई कर रहे हैं।
लंदन बहुत महंगा शहर होने से वह उपनगरों या सबर्ब में रहते हैं। अपना खर्च पूरा करने के लिये वह या तो किसी स्टोर या रेस्टोरेंट में काम करते हैं अथवा टैक्सी चलाते हैं। यह उनका शौक नहीं, जरूरत है।
स्कॉलरशिप पाने के बाद भी उन्हें अपने गुजारे के लिए कुछ न कुछ कमाई करनी ही पड़ती है। इन दिनों ब्रिटेन में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की जांच-परख सख्ती से करने की मांग तेज हो गई है। इनमें भारतीय विद्यार्थियों का भी समावेश है। सवाल यह है कि ब्रिटेन में अंतरराष्ट्रीय छात्रों, विशेषकर भारतीय छात्रों की जांच क्यों हो रही है? ब्रिटेन द्वारा भारतीय छात्रों और विदेशी कामगारों की कड़ी जांच या नियमों को सख्त करने का मुख्य उद्देश्य अवैध रूप से काम करने वालों पर लगाम लगाना और वीजा नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना है। इस संदर्भ में मुख्य कारण इस प्रकार से हैं- एक, अवैध रूप से काम करने पर रोक।
ब्रिटेन के होम ऑफिस (गृह विभाग) ने डिलीवरी, कूरियर और ऑनलाइन प्लेटफार्म के जरिये कमाई करने वाले कामगारों व छात्रों के लिए नियमों को कड़ा कर दिया है। सरकार यह जांचना चाहती है कि काम करने वाला व्यक्ति वही है, जो प्लेटफार्म पर पंजीकृत है या नहीं। दो, निर्धारित घंटों से ज्यादा काम या ओवर-वर्किंग। छात्र वीजा पर आये बहुत से लोग पढ़ाई के दौरान तय काम के घंटों (जैसे प्रति सप्ताह निर्धारित सीमा) से अधिक काम करते हैं।
इसकी जांच के लिए नियोक्ता (कम्पनियों) को शैक्षणिक सत्र और छुट्टियों के रिकॉर्ड रखने के निर्देश दिये गये हैं। तीन, भारी जुर्माना और सख्त नीतियां। ब्रिटेन ने बिना अनुमति या नियमों के विरुद्ध काम कराने वाले नियोक्ताओं पर सिविल जुर्माना बढ़ाकर 60,000 पौंड प्रति वर्कर तक कर दिया है, जिससे हर स्तर पर सघन जांच की जा रही है। चार, फर्जी दस्तावेजों या गलत जानकारी के जरिये प्रवेश पाने वाले मामलों को रोकने के लिए विश्वविद्यालयों और छात्रों के दस्तावेजों की सत्यता की जांच की जा रही है। बहुत से युवा विदेशी, जिनमें भारतीय भी हैं, विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेकर छात्र वीजा पर ब्रिटेन में प्रवेश करते हैं।
इनका उद्देश्य शिक्षा प्राप्त करना नहीं होता है बल्कि रोजगार की तलाश या राजनीतिक शरण लेना होता है, इसलिए ये पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। इनकी वजह से यूनिवर्सिटी ड्राप आउट, शरण लेने की निरंतर बढ़ती अर्जियां और माइग्रेशन को नियंत्रित करना ब्रिटेन में भयावह समस्या बन गई है। इसलिए यूके की सरकार ने सख्त स्पॉन्सरशिप नियमों का गठन किया, जिनमें यह भी शामिल है कि अगर किसी विश्वविद्यालय में ड्राप आउट होने वाले अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की संख्या अधिक है या वह सिस्टम का दुरूपयोग करता है, तो उसका रिक्रूटिंग लाइसेंस रद्द कर दिया जायेगा।
यह सख्त नियम इसलिए बनाना पड़ा क्योंकि सरकार के संज्ञान में आया था कि लोग स्टडी, वर्क या पर्यटन वीजा लेकर इंग्लैंड में प्रवेश करते हैं और फिर राजनीतिक कारणों के आधार पर शरण मांगने लगते हैं, जिससे शरण की मांग करने वालों की संख्या में जबरदस्त उछाल आ गया है। इसलिए यह सुनिश्चित किया जा रहा कि वीजा सिर्फ वास्तविक छात्रों को ही जारी किया जाये। नेट माइग्रेशन को नियंत्रित करने के लिए पोस्ट-स्टडी ग्रेजुएट रूट वीजा अवधि को भी कम कर दिया गया है। सख्त वीजा नियमों, महंगी रिहाइश और कठिन पोस्ट स्टडी जॉब मार्केट का प्रभाव यह पड़ा है कि यूके के लगभग 76 प्रतिशत विश्वविद्यालयों ने रिपोर्ट किया है उनके पास पहले की तुलना में इस बार भारतीय छात्रों की प्रवेश अर्जियां कम आई हैं।
छात्रों को अति प्रतिस्पर्धात्मक बाजार में प्रोफेशनल पार्ट-टाइम वर्क या ग्रेजुएट लेवल रोजगार मिलना भी मुश्किल हो गया है, जिससे जीविका-खर्च प्रबंधन हेतु संघर्ष करना पड़ता है। फिर नस्लीय भेदभाव में भी इजाफा हुआ है, जिससे भारतीय छात्रों के लिए इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त करने का सपना टूटता जा रहा है।
लेख- डॉ. अनिता राठौर के द्वारा