नवभारत निशानेबाज: पाप का घड़ा फूटते देर नहीं, अब खरात की खैर नहीं

Navbharat Nishanebaaz: समाज में खरे व खोटे की पहचान मुश्किल होती जा रही है। ढोंगी तांत्रिकों के जाल में फंसकर लोग शोषण का शिकार हो रहे हैं,  सत्ता व प्रभावशाली लोग भी ऐसे मामलों में घिरते नजर आते हैं।
Navbharat Marksman: The Vessel of Sin Is Bound to Shatter Soon; Now, There Is No Escape for the Corrupt.
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Tantrik Ashok Kharat Case: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, आजकल खरे-खोटे की पहचान कर पाना बहुत मुश्किल हो गया है। कहते हैं कि खोटा सिक्का असली सिक्के को चलन या सर्कुलेशन से बाहर कर देता है। लोग खरा सिक्का अपनी जेब में रख लेते हैं और खोटा सिक्का तुरंत चला देते हैं।'

हमने कहा, 'खरे और खोटे सरनेम भी होते हैं। डॉ. नारायण भास्कर खरे मध्यप्रांत और बेरार के मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार गिरने पर पं. रविशंकर शुक्ला मुख्यमंत्री बने थे। उस समय नागपुर सीपी एंड बेरार की राजधानी थी। दुर्गा खोटे अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री थीं।'

पड़ोसी ने कहा, 'खरे-खोटे की बात भूल जाइए, इस समय चचर्चा में तांत्रिक अशोक खरात है जो खुद को कैप्टन कहलाना पसंद करता है। वह पूछताछ करने वाले पुलिसकर्मियों को शाप देने की धमकी देता है। इस व्यभिचारी लंपट के चक्कर में अनेक नेता और अधिकारी आ गए थे। खरात के नाम से हमें गाना याद आ गया कहें कबीर सुनो भाई साधो बात कहूं मैं खरी, ये दुनिया एक नंबरी तो मैं दस नंबरी! खरी बात यह है कि लगभग 100 महिलाओं का शोषण करने वाले इस चरित्रहीन खरात के साथ अनेक बड़े नेताओं की तस्वीरें मौजूद हैं जो उसके पैर पूजते थे और अपने स्वार्थ के लिए उसके भक्त बन गए थे। उसने करोड़ों की संपत्ति जुटाई थी। महाराष्ट्र महिला आयोग की अध्यक्ष चाकणकर भी उसके चक्कर में आ गई थीं। वह खरात के एक ट्रस्ट में थीं।'

हमने कहा, 'ट्रस्ट का मतलब सिर्फ न्यास नहीं भरोसा या विश्वास भी होता है। खरात की करतूतों का भंडाफोड़ होने से उसके अंधभक्तों का विश्वास टूट गया। उसकी एक और ठगी सामने आई है। वह सिन्नर तहसील के मीरगांव स्थित ईशान्येश्वर मंदिर में कर्मकांड करते हुए अपने भक्तों में पहले प्लास्टिक का नकली सांप छोड़कर भय का संचार करता था और फिर बाधा दूर करने के नाम पर अपने ट्रस्ट के लिए लाखों रुपये वसूल करता था। वह 100 रुपये किलो की दर से जंगली इमली के बीज मंगाता था। इन बीजों को पॉलिश करवाने के बाद दिव्य मणि बताकर 10 हजार से 1 लाख रुपये में भक्तों को दिया करता था। वह खुद को ऑस्ट्रेलिया की मर्चेंट नेवी का कैप्टन तथा अंकशास्त्री या न्यूमरोलॉजिस्ट बताता था। भ्रष्ट नेताओं की काली कमाई को वह व्हाइट मनी में बदलने का काम भी करता था। चुनाव में खैरात बांटने वाले चतुर-चालाक नेता खरात के यार बने बैठे थे। खरात ने मुंह खोला तो उनकी भी खैर नहीं!'

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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