नवभारत: 90 वर्षों का अखंडित सफर, अविचलित-निरंतर; हम साक्षी हैं 'नव-निर्माण' के...

Ramgopal Maheshwari and Navabharat
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1934 की बसंत पंचमी पर जब स्व.श्री रामगोपालजी माहेश्वरी ने 'नवभारत' का प्रकाशन शुरू किया तो वो दौर बहुत चुनौतीपूर्ण था. यह चुनौती देश और दुनिया दोनों के समक्ष थी. वैश्विक नेताओं का बैर बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा था और अंग्रेजी हुकूमत संसार के कई कोनों में बसे अपने कब्जे को संभाल नहीं पा रही थी. कई बड़े देश एक दूसरे को खत्म करने में लगे हुए थे. जापान, अमेरिका, जर्मनी सहित कई देशों की सेनाएं सिर्फ और सिर्फ हिंसा पर उतारू थीं. ऐसे में एशिया के सबसे प्रमुख देश भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अगुवाई में स्वतंत्रता  सेनानियों के दोनों समूह (नरम दल और गरम दल) करोड़ों लोगों के भविष्य का नियोजन करने में लगे थे.

गांधी-नेहरू-पटेल-बोस जैसे दिग्गज नेताओं के विचारों में आजादी कूट-कूट कर भरी हुई थी. करोड़ों भारतवासियों को आजादी का सपना दिखाकर उसे पूरा करने की हिम्मत जुटाने वाले हजारों बहादुर बलिदानी सैनिकों और स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज को बुलंद करने का काम 'नवभारत' ने 1934 से शुरू किया. 30 का वह दशक दुनिया के इतिहास में इसलिए भी कभी भूला नहीं जा सकेगा क्योंकि उसके खत्म होते-होते दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया.

भारत की सेना भले ही औपचारिक रूप से निर्मित नहीं हुई थी, लेकिन हजारों भारतीय सैनिकों ने इस युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी. इधर भारत में आजादी के मतवालों ने हर गली-मोहल्लों में बच्चों-बच्चों में स्वतंत्रता की अलख जगा दी. अंग्रेजों ने जुल्म बढ़ाया तो भारतवासियों ने उतनी ही मुखरता से जवाब दिया. हम साक्षी रहे 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन के, जिसने अंग्रेजों की चूलें हिला कर रख दी थीं. अंग्रेज जब समझ गये कि अब भारत को आजाद करना ही होगा तब बांटों और राज करो की नीति को अपना कर विभाजन की साजिश को अंजाम दे डाला.

भारत को आजाद करने के पहले तबाही की इस साजिश को भारी कीमत चुका कर भी भारतवासी झेल गये. आजादी तो मिली लेकिन बापू को एक सिरफिरे ने गोली मारकर उस विचार को खत्म कर दिया, जिसको दिग्बिन्दु मानकर आज पूरी दुनिया आगे बढ़ रही है. टुकड़ों में बसे भारत को एकसंघ बनाने में लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की हर रणनीति के हम गवाह रहे. ऐसे सभी सुख-दुख के हम साक्षी रहे.  दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक क्रांतिकारी डा.बाबासाहब आम्बेडकर की अगुवाई में जब राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के साथ मिलकर भारत को संविधान की अनमोल भेंट दी, तब भी करोड़ों भारतवासियों की खुशी में हम शामिल रहे.

1952 का पहला आम चुनाव हो या कश्मीर को भारत गणराज्य का अविभाज्य अंग बनाने की रणनीति,  सभी का हम हिस्सा रहे. 50 के दशक के अंत में जब भारत अपनी लोकतांत्रिक जड़ों को मजबूती प्रदान करने में तेजी से आगे बढ़ रहा था तब भाषायी राज्य की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान कर महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य बनते भी हमने देखा. भाखड़ा-नंगल, हिराकुड जैसे बड़े-बड़े बांध, भिलाई-राउरकेला और दुर्गापुर जैसे विशाल स्टील प्लांट के साथ  आईआईटी, आईआईएम, इसरो, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के संस्थानों की नींव रखते हुए प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू बहुत तेजी से भारत को आगे बढ़ा रहे थे कि पड़ोसी चीन की नींद उड़ गई. हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा बुलंद कर गद्दारी करने वाले चीन ने जब 1962 में पहला युद्ध थोपा तो भी भारत का हौसला नहीं डिगा.

करोड़ों भारतवासियों ने अपने घरों से सोना-चांदी, पैसा-रुपया, धन-दौलत, पूत-सपूत सब कुछ देश को दान में दे दिया. इस अभूतपूर्व शाश्वत घटना के भी हम साक्षी रहे. सादगी की प्रतिमूर्ति रहे लाल बहादुर शास्त्री के 'जय जवान-जय किसान' के नारे ने पूरे देश में स्वाभिमान की नई ऊर्जा पैदा कर दी. 1965 और 1971 में पाकिस्तान को धूल चटाना हो या बांग्लादेश को आजाद कराना, हमने अपनी सेनाओं और फील्ड मार्शल मानेकशॉ जैसे जांबाज अफसरों की बहादुरी की हर एक गाथा को देश और दुनिया तक पहुंचाई.

जब कई विकसित देश महिलाओं को परदे से बाहर नहीं निकाल पा रहे थे तब भारत ने इंदिरा गांधी के रूप में पहली दबंग प्रधानमंत्री को कमान सौंप दी. दुनिया का कोई भी देश भारत पर अपनी कुदृष्टि न डाले, इसलिए पोखरण में पहले परमाणु परीक्षण का संदेश हमने ही प्रसारित किया. 70 के दशक में भारत की धाक तो बढ़ी, लेकिन देशवासियों को इमरजेंसी का दंश भी झेला. आपातकाल से बाहर निकलने में पूरे देश के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने का सौभाग्य हमें मिला. उसके बाद 80 के दशक में एशियन खेल हों या रंगीन टीवी का पदार्पण ऐसे कई खट्टे-मीठे अनुभव आये. 

राजीव गांधी जैसा दूरदर्शी प्रधानमंत्री मिला, जिसने कम्प्यूटर युग में भारत का प्रवेश कराया. दुनिया आज जिस भारत की डिजिटल क्रांति का लोहा मानती है, उसको आगे बढ़ाने में भी हम कभी पीछे नहीं रहे. यह वह दौर था जब धरती पर भारत का डंका बजने लगा और इसी दशक में राकेश शर्मा ने अंतरिक्ष पहुंचकर देशवासियों को बताया कि 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा'. मंडल-कमंडल जैसे विवादों से हमारे बीच वैचारिक मतभेद जरूर हुए, लेकिन मनभेद हमने कभी नहीं होने दिया. 

90 के दशक में जब दुनिया में अर्थव्यवस्था की सभी सीमाएं खत्म हुई,  उस समय पी.वी. नरसिंह राव द्वारा भारत में किये गये क्रांतिकारी परिवर्तन के हम साक्षी रहे. इसी दशक में प्रधानमंत्री पं. अटल बिहारी वाजपेयी के मजबूत नेतृत्व में दूसरा परमाणु परीक्षण किया और दशक के अंत में पाकिस्तान को कारगिल युद्ध में पटकनी देने के साथ अपने इरादे समझा दिया कि भारत को कमजोर समझने की कोई भी भूल न करें.

2000 के दशक के आखिरी-आखिरी में जाने-माने अर्थशास्त्री, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की गठबंधन मजबूरियों के बावजूद हमने शिक्षा, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, टेक्नोलॉजी, उद्योग-व्यापार सहित सभी क्षेत्रों में अपनी पकड़ इतनी मजबूत बना ली कि 2008 में जब पूरा विश्व महामंदी की चपेट में आ गया तब भारत के उस समय 125 करोड़ से ज्यादा लोगों पर उसका कोई असर नहीं पड़ा. उसके बाद 2010 के दशक की शुरुआत तक तो अमेरिका जैसी महाशक्ति में भारतवंशी निर्णायक होने लगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का युग आया और जटिल टैक्स कानूनों  में सुधार के जीएसटी की व्यवस्था लाई और 'भारत' को 'नवभारत' ने महाशक्तियों की कतार में खड़ा कर दिया.  मिसाइल मैन के नाम से विख्यात भारत मां के सपूत वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल  कलाम ने राष्ट्रपति के रूप में देश को विज्ञान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. 

हमारी बहादुर सेना जहां सीमाओं पर दुश्मन के दांत खट्टे करने में तत्पर है तो अर्धसैनिक बल और पुलिस बल आंतरिक सुरक्षा की डोर थामे हुए हैं. हमारे स्वास्थ्य कर्मी जहां कोरोना जैसी महामारी से निपटने में सक्षम रहे वहीं लाखों-करोड़ों शिक्षक सभी देशवासियों के साथ मिलकर बौद्धिक महाशक्ति बनाने में लीन हैं. लोकतंत्र के अन्य तीनों अंग विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी के कंधे से कंधा मिलाकर 'नव भारत'  90 वर्षों में बिजली-सड़क-पानी-अनाज जैसी मूलभूत जरूरतों में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के महायज्ञ में अपने कर्मों की आहुति दे रहा है.

सामाजिक सरोकार हो या धार्मिक सहिष्णुता, इस माला को 'नवभारत' ने एक ऐसे धागे में पिरोया कि सुश्री द्रौपदी मुर्मू राष्ट्राध्यक्ष के रूप में भारत के सर्वोच्च पद पर आसीन हुई और पूरा देश गौरवान्वित हुआ. विगत 90 वर्षों से 'नवभारत' अपने सफर पर अखंडित-अविचलित प्रगति पथ पर है. यह सफर 'नव भारत' के स्वर्ण काल मतलब 2034 में और स्वतंत्र भारत के स्वर्ण काल अर्थात 2047 तक आप सभी पाठकों और शुभचिंतकों की सद्भावना के साथ निरंतर जारी रहेगा, इस उम्मीद और हौसले के साथ.... जय हिन्द.

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