निशानेबाज- किसकी किस्मत में लिखा है कौन सा घाट, यहीं रखा रह जाता है सारा ठाठ-बाट

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अंत्येष्टि निगमबोध घाट पर किए जाने को लेकर सियासत जारी है। इसी मुद्दे पर पड़ोसी और निशानेबाज के बीच चर्चा हुई है। जिसमें पड़ोसी ने इस समस्या का हल भी बताया है।
निशानेबाज- किसकी किस्मत में लिखा है कौन सा घाट, यहीं रखा रह जाता है सारा ठाठ-बाट
मनमोहन सिंह (डिजाइन फोटो)
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नवभारत डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, घाट कई प्रकार के होते हैं। पवित्र नदियों का घाट जहां लोग आस्था की डुबकी लगाते हैं, धोबी घाट जहां मैले वस्त्र धुलकर उजले हो जाते हैं और तीसरा स्मशान घाट! इस समय विवाद इस बात को लेकर है कि असाधारण पीएम रहे डा. मनमोहन सिंह की अंत्येष्टि साधारण घाट पर क्यों की गई? विपक्ष ने इसे सरकार के खिलाफ मुद्दा बनाया है जबकि बीजेपी ने कहा कि कांग्रेस इस मामले में बेवजह की राजनीति कर रही है। आपकी इस बारे में क्या राय है?’’

हमने कहा, ‘‘जब व्यक्ति इस असार संसार से चला जाता है तो साथ में एक सुई तक नहीं ले जाता लेकिन अपने पीछे अपनी कीर्ति व यश छोड़ जाता है। इतना अवश्य है कि उसे सम्मानजनक अंतिम विदाई दी जाए। कुछ मामलों में बड़ा विरोधाभास भी रहता है। अंग्रेजी राज के खिलाफ आजीवन संघर्ष करनेवाले महात्मा गांधी की समाधि का नाम राजघाट रख दिया गया।’’

पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का समाधि स्थल शांति वन, इंदिरा गांधी का शक्ति स्थल, राजीव गांधी का वीर भूमि, चौधरी चरणसिंह का किसान घाट कहलाता है। तेलुगू बिड्डा कहलाने वाले पूर्व पीएम पीवी नरसिंहराव के पार्थिव शरीर का दिल्ली में अंतिम संस्कार न करते हुए सीधे हैदराबाद रवाना कर दिया गया था? अब विपक्ष ने मुद्दा उठाया है कि मनमोहन सिंह के अंतिम संस्कार और समाधि के लिए बीजेपी सरकार 1,000 गज जमीन भी न दे सकी।’’

हमने कहा, ‘‘अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को क्रूर ब्रिटिश शासकों ने 2 गज जमीन भी मुहैया नहीं कराई थी। एक शेर है- हर किसी को मुकम्मिल जहां नहीं मिलता, किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता! इसी मौके पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने भावुक होकर कहा कि जब उनके पिता का 2020 में निधन हुआ तो कांग्रेस ने उनके लिए एक शोकसभा तक नहीं की थी।’’

पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, बीजेपी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के समाधि स्थल को सदैव अटल का नाम दिया। जो भी हो घाट और समाधि स्थल को लेकर होनेवाली बहस का एक ही इलाज है। अमेरिका में सारे राष्ट्रपतियों का कब्रस्तान एक ही है जिसे अर्लिंगटन सिमेट्री कहा जाता है। इसी प्रकार भारत में दिवंगत राष्ट्रपतियों व प्रधानमंत्रियों की अंत्येष्टि के लिए एक स्थायी स्थल तय कर दिया जाए ताकि बाद में बहसबाजी न हो।’’

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा

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