नवभारत संपादकीय: क्यों लटका हुआ है पिछड़े क्षेत्रों का विकास? असंतुलन की पूरी कहानी

Maharashtra Regional Imbalance: विदर्भ व मराठवाड़ा में शिक्षा, सिंचाई समेत कई क्षेत्रों में विकास का असंतुलन बना हुआ है। 2020 से राज्यपाल के तय फार्मूले के अनुसार विकास निधि दी जा रही है।
Navbharat Editorial: Why is the development of backward regions stalled? The full story of the imbalance
विदर्भ, मराठवाड़ा, विकास, (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
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Vidarbha Marathwada Development Backlog: महाराष्ट्र में विदर्भ और मराठवाडा ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पश्चिम महाराष्ट्र की तुलना में विकास का असंतुलन बना हुआ है। शिक्षा, कृषि, सिंचाई, उद्योग, स्वास्थ्य व रोजगार के मामले में यह फर्क साफ नजर आता है। इन क्षेत्रों का बैकलॉग इसलिए बढ़ा, क्योंकि अनेक दशकों तक पिछली सरकारों ने विकास को पुणे-बारामती तक ही केंद्रित रखा।

25 जून 1994 को 3 वैधानिक विकास बोर्ड गठित किए गए थे। उचित निर्देशांकों के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में विकास के स्तर का पता लगाना, वहां किए जाने वाले खर्च के लिए सुझाव देना तथा हर वित्त वर्ष की समाप्ति के बाद वहां हुए कामकाज के बारे में 3 माह के भीतर वार्षिक रिपोर्ट राज्यपाल को भेजना जैसी जिम्मेदारी बोर्ड को दी गई थी।

विकास बोर्ड बंद होने के बाद भी विदर्भ के बैकलॉग पर बहस जारी

यह रिपोर्ट राज्य विधानमंडल में पेश की जाती थी। इन तीनों विकास बोर्ड को 30 अप्रैल 2020 को बंद कर दिया गया ताकि इन क्षेत्रों में विकास का बैकलॉग और न बढ़े। 2020-21 से राज्यपाल द्वारा निर्धारित फार्मूले से इन क्षेत्रों को विकास राशि दी जाती है। विदर्भ को 23.03 प्रतिशत, मराठवाडा को 18.75 प्रतिशत तथा शेष महाराष्ट्र को 58.23 प्रतिशत राशि देने का प्रावधान था।

सरकार का दावा है कि विदर्भको 25.76 प्रतिशत तथा मराठवाडा को 18।82 प्रतिशत फंड दिया गया, जो फार्मूले से कुछ ज्यादा था। राज्यपाल ने अक्टूबर 2022 के बाद से केंद्र सरकार को 5 बार पत्र भेजकर विदर्भ, मराठवाडा व शेष महाराष्ट्र के लिए विकास बोर्ड गठित करने का अनुरोध किया। इसका कोई जवाब नहीं आया।

सरकार का दावा है कि विदर्भऔर मराठवाडा का बैकलॉग क्रमशः 94 प्रतिशत व 99 प्रतिशत घट गया। 2020 से 2025 तक विदर्भ में 13,42,798 सूक्ष्म, लघु व मध्यम उपक्रम (एमएसएमई) पंजीबद्ध किए गए। इनमें विदर्भमें 57.88 लाख तथा मराठवाडा में 39.13 लाख रोजगार का सृजन हुआ। इसका कोई जवाब नहीं आया।

विदर्भ के संतुलित विकास की मांग, अचलपुर को नया जिला बनाने पर जोर

सरकार का यह भी दावा है कि राज्य के सभी जिलों में सिंचाई का बैकलॉग मार्च 2011 में दूर कर दिया गया। यह आंकड़े अपनी जगह हैं लेकिन अब भी विदर्भ में पर्याप्त सिंचाई व्यवस्था नहीं हो पाई है तथा खेती वर्षा पर निर्भर है। यवतमाल व वर्धा जिले में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं हो रही हैं। अमरावती जिला बहुत बड़ा है जिसमें मेलघाट शामिल है, जहां कुपोषण समस्या व्याप्त है।

जिस प्रकार भंडारा, चंद्रपुर व अकोला जिलों का विभाजन कर नए जिले बनाए गए वैसे ही अमरावती को विभाजित कर अचलपुर को नया जिला बनाया जाना चाहिए, ऐसा करना प्रशासन और विकास के दृष्टिकोण से उचित होगा। नागपुर में पिछले 1 दशक में केंद्रीय मंत्री नीतिन गडकरी व मुख्यमंत्री फडणवीस के प्रयासों से विकास हुआ लेकिन विदर्भ के अन्य जिले भी विकास की राह देख रहे हैं, उन्हें न्याय मिलना चाहिए।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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