

Maharashtra Government Proposal To Reduce Juvenile Age To 16: 2015 में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में प्रावधान किया गया कि जघन्य अपराध में 16 से 18 वर्ष के अपराधी को भी न्यूनतम 7 वर्ष की सजा दी जा सकती है, बशर्ते जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड साबित करे कि उसमें अपराध का नतीजा समझने की मानसिक व शारीरिक क्षमता है। तब उस पर वयस्क के समान मामला चलाया जा सकता है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और अपराधों पर सख्ती से अंकुश लगाने के उद्देश्य से घोषणा की है कि नाबालिगों से अपराध कराने वाले संगठित अपराधी गिरोहों के खिलाफ 'मकोका' जोर-शोर से इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार केंद्र के पास प्रस्ताव भेजेगी कि नाबालिग अपराधी की उम्र 18 से घटाकर 16 वर्ष कर दी जाए। अपराधी गिरोह जानबूझकर नाबालिगों से जोखिम भरा अपराध करवाते हैं जिसमें नशीले पदार्थों की तस्करी व बिक्री तथा सुपारी देकर हत्या करवाना शामिल है।
इसकी वजह यह है कि नाबालिग अपराधी को सुधार गृह भेजा जाता है और उसे सजा भी कम होती है। शातिर अपराधी आर्थिक लालच देकर या डरा-धमकाकर नाबालिगों से अपराध करवाते हैं और इस तरह खुद को बचा लेते हैं। इस वजह से बाल अपराधियों की तादाद में वृद्धि हो रही है। इसलिए राज्य पुलिस बल को निर्देश दिया गया है कि नाबालिगों से अपराध कराने वाले गिरोह से सख्ती से निपटें और उस पर मकोका कानून की धारा 2 के अनुसार कार्रवाई करें।
बाल अपराधियों के अपराधों के लिए उनके तथाकथित बॉस को पूरी तरह जिम्मेदार माना जाएगा चाहे वह अपराध की जगह पर मौजूद रहे या न रहे। ये गिरोह और उनके सरगना अपनी आपराधिक गतिविधियों का विस्तार करने के लिए ढाल के रूप में नाबालिगों का इस्तेमाल करते हैं। प्राणघातक हमला, हत्या, हत्या के प्रयास, हिंसक लूटपाट में संलग्न 16 वर्ष के अपराधी को भी वयस्क माना जाए, इस आशय की मांग केंद्र सरकार से की जाएगी।
संगठित अपराध पर रोक लगाने के लिए यह कदम आवश्यक माना जा रहा है। अपराधी गिरोह संगठित करने वाले डरा-धमकाकर और मार-पीटकर बाल अपराधी तैयार करते हैं और उनके जरिए लूटपाट व खून-खराबे को अंजाम देते हैं। बाल अपराधी उनके चंगुल से निकल नहीं पाता। अपराध की दुनिया में जाना आसान है जबकि बाहर निकल पाना बेहद मुश्किल। गिरोह के सरगनाओं और पुलिस के बीच बाल अपराधी बुरी तरह फंस जाता है और उसके अपराधों का ग्राफ निरंतर बढ़ता चला जाता है।
बाल अपराध न्याय कानून (जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 1986) के अनुसार 16 वर्ष से कम आयु के लड़कों व 18 वर्ष से कम आयु की लड़कियों को नाबालिग माना जाता है। 2000 में संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन की सिफारिशों को देखते हुए इस कानून ने संशोधन कर बाल अपराधी की अधिकतम आयु सीमा 18 वर्ष कर दी गई। दिल्ली के निर्भया प्रकरण से यह बात सामने आई कि एक अपराधी 18 वर्ष से कुछ माह कम का होने की वजह से कठोर सजा से बच सकता था। इसलिए कानून को संशोधित करने का दबाव आया।