

लातूर में फसल बर्बाद होने और बेटी की मेडिकल फीस न भर पाने से किसान ने आत्महत्या की।
नांदेड़ में 10 हजार रुपये के कर्ज पर 70 हजार रुपये मांगने और किसान से मारपीट के आरोप।
सूखे, कर्ज के बोझ और आर्थिक तंगी से किसानों का संकट गहराया।
किसानों को समय पर मुआवजा, फसल बीमा, सस्ता संस्थागत कर्ज और साहूकारों पर सख्त कार्रवाई की मांग।
Drought Crisis Farmer Debt and Moneylender Exploitation: सूखा स्थिति से उत्पन्न कृषि संकट के दौर में किसानों की दुर्दशा उन्हें मौत के मुंह में ले जा रही है। ऐसी 2 घटनाएं हाल ही में हुई हैं। लातूर में एक किसान ने फसल नष्ट होने और अपनी बेटी की मेडिकल फीस भर पाने में असमर्थ रहने से आत्महत्या कर ली। इसी तरह नांदेड़ में एक निजी फाइनांस कंपनी के कार्यालय में चंद्रकांत शिंदे नामक 40 वर्षीय किसान को फांसी के फंदे से लटका पाया गया। उसने कंपनी से 10,000 रुपये कर्ज लिया था।
परिजनों का आरोप है कि उससे कंपनी ने 70,000 रुपये मांगे। उसे बंधक बनाकर बुरी तरह मारा-पीटा गया और उसकी मौत को आत्महत्या का रूप दे दिया गया। कितने ही किसान इस तरह निजी कंपनियों या साहूकारों के कर्जजाल में फंसे हुए हैं जो मनमाना ब्याज लगाते हैं। फसल नष्ट होना, कर्ज का बोझ बढ़ना, परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी न कर पाना, बीमारी में इलाज के पैसे नहीं होना जैसी बातें किसान को इतना परेशान कर देती हैं कि वह खुदकुशी कर लेता है या फिर साहूकार उसकी जान के दुश्मन बन जाते हैं।
10 हजार रुपये की रकम का कर्ज देकर 70,000 रुपये का तकाजा करना कहां का न्याय है? यह अमानवीय शोषण की पराकाष्ठा है। यद्यपि राज्य सरकार ने 300 तहसीलों को सूखा प्रभावित घोषित किया है और दीपावली के पहले राहत देने का आश्वासन दिया है फिर भी इन घोषणाओं का तब महत्व है जब समय पर राहत मिल जाए। इस तरह की घोषणाओं से नष्ट फसल वापस नहीं आती और न साहूकार के अत्याचार को रोका जा सकता है।
अधिकारियों को समय सीमा बतानी चाहिए कि किसानों को मुआवजा कब तक मिलेगा। फसलों के नुकसान का जायजा लेकर पंचनामा तुरंत होना चाहिए, किसानों को अल्प दर पर संस्थागत कर्ज प्रदान किया जाए तथा फसल बीमा की रकम उपलब्ध कराई जाए। कोई भी निजी फाइनांस कंपनी या साहूकार मनमाना व्याज न लगाने पाए। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है अन्यथा ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों का शोषण होता रहेगा।
आपदाग्रस्तों को समय रहते इलाज उपलब्ध कराया जाए तथा उनका हौसला बढ़ाया जाए, नांदेड़ के किसान की संदिग्ध स्थिति में मौत की जांच की जाए कि यह आत्महत्या थी या हत्या? पुलिस और वित्त नियामक पता लगाएं कि क्या साहूकार वैध तरीके से काम कर रहे हैं या आतंकित कर मनमानी कर्जवसूली कर रहे हैं। भविष्य में ऐसे मामले न हों, इसकी सावधानी बरती जाए क्योंकि सूखाग्रस्त किसानों का शोषण करने वालों की कमी नहीं है और ऐसे लोग अपने क्षेत्र में काफी दबदबा रखते हैं।
किसानों को राहत देना आवश्यक है किंतु यह स्थायी ग्रामीण आय का विकल्प नहीं बन सकता। इस कठिन घड़ी में किसानों की मानवीय गरिमा कायम रखनी होगी। शासन उन्हें धैर्य बंधाए कि वह अकेले नहीं हैं। मराठवाड़ा ही नहीं विदर्भ में भी अनेक किसान निजी साहूकारों के चंगुल में फंसे हुए हैं, जो 30 से 70 फीसदी तक ब्याज वसूल करते हैं। खेत में फसल नहीं, हाथ में काम नहीं, सिर पर कर्ज का बोझ और दरवाजे पर वसूली का अपमानजनक तकाजा, ऐसी स्थिति में किसान को कोई मार्ग नजर नहीं आता।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा