Navabharat Nishanebaaz: चाहे दिल्ली हो या देहरादून, लेट मानसून प्लीज कम सून

Delayed Monsoon Concerns: भीषण गर्मी, उमस और मानसून की देरी को लेकर लोगों की बेचैनी बढ़ रही है। बदलते मौसम और कम बारिश की आशंकाओं के बीच जल संरक्षण पर भी चर्चा तेज हो गई है।
Navabharat Nishanebaaz: Be it Delhi or Dehradun, late monsoon, please come soon.
(सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
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Impact Of Late Monsoon: पड़ोसी ने हमसे कहा, 'निशानेबाज, हमें लग रहा है कि इस बार मानसून लेट आ रहा है। बस, ट्रेन या फ्लाइट लेट हो सकती है, लेकिन मानसून को राइट टाइम पर आना चाहिए। हम कब तक 42 से 45 डिग्री की गर्मी और भारी उमस झेलेंगे। यह गर्मी तो कूलर और एसी को भी फेल कर रही है। इसलिए हमारी गुहार है कि दिल्ली हो या देहरादून, लेट मानसून, प्लीज कम सून!'

हमने कहा, 'आप तो बरसात के लिए ऐसे बेचैन हो रहे हैं जैसे चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र में पड़ने वाली वर्षा की बूंद के लिए व्याकुल रहता है। मौसम विभाग बता चुका है कि इस बार सिर्फ 90 प्रतिशत पानी बरसेगा। बारिश के दिन भी कम रहेंगे। इजराइल में कभी- कभार हल्का सा पानी बरसता है। वहां के वैज्ञानिक कहते हैं कि भारत अपने मानसून का एक दिन का पानी हमें दे तो अपनी जमीन को सरसब्ज बना देंगे।'

मानसून का इंतजार: विदर्भ के किसानों की उम्मीदें बारिश पर टिकीं

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, अरब देशों में वर्षा नहीं होती। वहां के अरब शेख मानसून का नजारा देखने मुंबई आते हैं और वहां के होटलों में ठहरकर खिड़की से देखते हैं कि काले-कजरारे बादल कैसे घुमड़ते हैं, बिजली कैसे चमकती है। मरीन ड्राइव पर समुद्र कैसे उफान मारता है और मुंबई की सड़कें कैसे झील या नदी बन जाती हैं।' हमने कहा, 'पश्चिम महाराष्ट्र में सिंचाई की उत्तम व्यवस्था है लेकिन विदर्भ के 11 जिले वर्षा पर निर्भर हैं। यवतमाल के किसान सबसे ज्यादा आत्महत्या करते हैं। बारिश जल्दी आए तो कलेजे में ठंडक पड़े। कृषि कार्य शुरू हो जाएं। हिंदी प्रदेशों में बारिश का स्वागत करते हुए कहा जाता है- बरसो राम धड़ाके से, बुढ़िया मर गई फाके से!'

बारिश पर पड़ोसी की दिलचस्प टिप्पणी

पड़ोसी ने कहा, 'निशानेबाज, जब चींटियां अपने मुंह में अंडे लेकर निकलती हैं, चिड़िया धूल में नहाने लगती हैं और काले बादल देखकर मोर खुशी से पंख फैलाकर नाचने लगता है तो समझ लेना मानसून आया है।'

हमने कहा, 'जब तक मानसून नहीं आता तब तक आप राज कपूर की पुरानी फिल्म 'बरसात' या देव आनंद की 'बारिश' देखिए। चाहें तो अभी से छतरी और रेनकोट खरीदकर रख लीजिए, फिर भी पानी न बरसे तो मानसून का नाम बदलकर 'मान लेट' कर देना!'

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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