

दिल्ली के बोट क्लब और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की पाबंदियों को लेकर सवाल उठाए गए।
लेख में लोकतंत्र की असली कसौटी जनता की आवाज को संसद तक पहुंचने देना बताया गया।
अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में संसद के पास विरोध प्रदर्शन के लिए उपलब्ध स्थानों का उदाहरण दिया गया।
राजधानी में शांतिपूर्ण विरोध के लिए पर्याप्त जगह और लोकतांत्रिक अधिकारों पर जोर दिया गया।
Right to Protest Near Parliament: लोकतंत्र की असली परीक्षा इस बात से नहीं होती कि संसद की इमारत कितनी भव्य है, यह इस बात से होती है कि उसकी देहरी तक आम आदमी की आवाज कितनी आसानी से पहुंच सकती है। कभी दिल्ली का बोट क्लब जनाक्रोश, जनसंघर्ष और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का बड़ा मंच हुआ करता था। फिर विरोध की उस आवाज को वहां से हटा दिया गया। अब जंतर-मंतर से भी बंदिशों और धरना-प्रदर्शनों को राजधानी के केंद्र से दूर ले जाने की तैयारी कर ली गई है। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर सरकार जनता की आवाज से इतनी असहज क्यों है? दुनिया के सारे प्रमुख लोकतंत्रों में जन प्रतिरोध के लिए संसद के बिल्कुल आसपास ही जगह मुहैय्या कराई गई है।
अमेरिका में राजधानी वॉशिंगटन जहां देश की संसद है, उसके बिल्कुल 200 मीटर के दायरे में जन प्रतिरोध के लिए जगह मौजूद है। 'कैपिटल हिल' से खड़े होकर जन प्रतिरोध को न केवल देखा और सुना जा सकता है, बल्कि संबोधित भी किया जा सकता है। यही स्थिति लंदन में संसद के बिल्कुल निकट लोगों के विरोध प्रदर्शन हेतु पार्लियामेंट स्क्वायर का मौजूद होना है, जहां लोग धरना प्रदर्शन कर सकते हैं। इसी तरह कनाडा में ओटावा का पार्लियामेंट हिल संसदीय प्राधिकरण की अनुमति और क्षेत्र विशेष की शर्तों के साथ धरना प्रदर्शनों के लिए मौजूद है।
फ्रांस में पेरिस का प्लास द लॉ रिपब्लिक सार्वजनिक चौकों पर रैलियों और जुलूस की अनुमति देता है, पूर्व सूचना के साथ। यही स्थिति जर्मनी में भी है, जहां संसद के 300 मीटर के भीतर लोग अपने प्रतिरोध का परचम फहरा सकते हैं। पिछले दिनों भारत सरकार ने जंतर-मंतर को धरना प्रदर्शनों के लिए डी नोटिफाई कर दिया गया है और राजधानी दिल्ली में धरना प्रदर्शनों के लिए 3 स्थान तय किए हैं, रामलीला मैदान जो कि संसद से 5 किलोमीटर दूर है, बुराड़ी का निरंकारी मैदान जो संसद से 22 किलोमीटर दूर है और तीसरा पूर्वी दिल्ली स्थिति सीबीडी ग्राउंड जो कि पार्लियामेंट से 13 किलोमीटर दूर है।
ऐसे में अगर इन जगहों पर जन-प्रदर्शन होते भी हैं, तो उसका सरकार या सत्ता पर क्या असर पड़ेगा? यह तो वही होगा जैसे कि जंगल में मोर नाचा, किसने देखा? क्या राजधानी की व्यवस्था बनाए रखने का अर्थ जनता के असंतोष को उसकी आंखों से ओझल करना है? लोकतंत्र में विरोध की आवाज केवल उठनी ही नहीं चाहिए, बल्कि उसे सत्ता के कानों तक पहुंचनी भी चाहिए, कभी इंडिया गेट के निकट बोट क्लब के लॉन सत्ता के सामने जन असंतोष दर्ज कराने की प्रमुख जगह हुआ करता था।
अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लाखों किसानों का जमावड़ा हुआ और इस आंदोलन ने राजीव गांधी सरकार पर किसानों की मांगों को लेकर दबाव बनाया। इससे नाराज तत्कालीन सरकार ने अंततः बोट क्लब पर बड़े प्रदर्शनों को प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद 1993 में जंतर-मंतर जनविरोध को स्वर देने की संसद के निकट एक प्रमुख -जगह के रूप में उभरा, अन्ना हजारे का आंदोलन हो या निर्भया कांड के बाद न्याय की मांग को लेकर उमड़ा जनाक्रोश, इस जगह ने विरोध को राजधानी के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बना दिया।
सवाल यह है कि दिल्ली में नए निर्धारित स्थलों में धरना प्रदर्शनों के होने का आखिर क्या असर रह जाएगा? स्थान की दूरी के साथ परिवहन, आयोजन का खर्च, धरना स्थल पर पानी, शौचालय, चिकित्सा सुविधा की मौजूदगी और सबसे बड़ी बात यह कि राजधानी की इन सुदूर जगहों पर अगर धरना प्रदर्शन आयोजित होते हैं, तो उन तक मीडिया कैसे पहुंचेगी और मीडिया नहीं जाएगी।, तो सरकार पर किसी तरह का दबाव कौन बनाएगा?
दिल्ली पुलिस के 11 अक्टूबर के आदेश के तहत जंतर-मंतर रोड को निर्धारित विरोध स्थल की सूची से हटा दिया गया और राजधानी में 3 जगहों को धरना प्रदर्शन के लिए अधिकृत किए जाने की बात हुई। इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
लेख-वीना गौतम के द्वारा