

Women Safety Moral Policing: पुरुष वर्चस्व की विकृत मानसिकता और दकियानूसी विचारों की कुछ राज्यों में इतनी गहरी पैठ है कि वहां किसी लड़की या महिला की इज्जत व जीवन आज भी असुरक्षित है। बिहार व ओडिशा की घटनाएं चीख-चीखकर सवाल कर रही हैं कि स्त्रियों के मान-सम्मान व स्वतंत्रता पर कब तक आंच आती रहेगी ? बिहार के जमुई में सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी हुआ जिसमें कोचिंग क्लास से एक साथ लौट रहे एक नाबालिग लड़के व लड़की को लोगों की भीड़ ने घेर लिया, मारपीट की और लड़की से यौन दुर्व्यवहार किया।
इस मामले में पुलिस ने सभी 7 अत्याचारियों को गिरफ्तार किया और जांच के लिए एसआईटी गठित की गई। इसी तरह ओडिशा के ढेंकनाल जिले में लोगों के समूह ने युवक और युवती के साथ बदसलूकी व मारपीट की। खुद को नैतिकता के ठेकेदार बताने वाले ऐसे लोग दरिंदे होते हैं जो किसी युवक-युवती को साथ देखते ही गुंडागर्दी करने लग जाते हैं।
यह लोग वास्तव में वासना के कीड़े होते हैं और मौके की ताक में रहते हैं। वह दिखाना चाहते हैं कि वह मॉरल पोलिसिंग कर रहे हैं और तत्काल अपने तरीके से तालिबानी फैसला कर रहे हैं। डिजिटल युग में तो यह मामला और भी गंभीर हो गया है। वह लड़की या महिला को दी जा रही सजा के नाम पर वीडियो बनाते हैं और उसे सर्कुलेट करते हैं। जमुई व ढेंकनाल के प्रकरणों में शामिल सभी दुष्टों को पकड़कर कड़ी सजा देनी होगी।
बिहार के नालंदा जिले में भी कुछ महीने पहले एक महिला से बीच सड़क पर दुर्व्यवहार किया गया था जिसका वीडियो सामने आया था। इससे नालंदा से लेकर सामने आया था। इससे नालंदा से लेकर पटना तक पुलिस प्रशासन में खलबली मच गई थी। इस तरह नारी अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया जाना अत्यंत निंदनीय है। गुरुग्राम में सिया नामक युवती बाइक चला रही थी। तभी एक कार ने उसका पीछा किया और बाद में टक्कर मार दी जिससे सिया सड़क पर गिर पड़ी।
क्या लड़कियों का बाइक चलाना गुनाह है? ऐसे मामलों में तत्काल निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और सबूत सुरक्षित रखकर अदालत में तेजी से मामला चलाकर अभियुक्तों को कठोर सजा दी जानी चाहिए। ऐसे अत्याचार की घटना का राजनीतिकरण या जातीय ध्रुवीकरण करना कदापि उचित नहीं है। आम तौर पर हिंदी भाषी प्रदेशों में लड़के-लड़की की जाति को मुद्दा बनाकर मामले को तूल दिया जाता है। अंतरजातीय विवाह करने वालों की भी शामत आ जाती है।
मुद्दा यह है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून होने पर भी ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों होती हैं? लड़कियों व महिलाओं के प्रति समाज का दृष्टिकोण कब बदलेगा ? समाज को सोचना होगा कि स्कूल, कॉलेज, सार्वजनिक स्थलों पर व प्रवास के दौरान युवतियों की सुरक्षा के लिए कौन-से उपाय किए जाएं? यौन अपराधों के मामले लंबे नहीं चलने चाहिए अन्यथा आरोपी जमानत पर छूटकर पीड़िता के परिजनों और गवाहों को आतंकित करने लगता है। समाज में कानून-व्यवस्था ही नहीं, मानसिकता में भी सुधार जरूरी है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा