संपादकीय: न्यूनतम समर्थन मूल्य का मुद्दा, आंदोलनकारी किसानों से बातचीत जल्दी क्यों नहीं

यदि सरकार कृषि उत्पादों के बाजार मूल्य और एमएसपी के बीच के अंतर की रकम किसानों को दे तो भी केवल 27,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे जो कि जीडीपी का 0.1 प्रतिशत है।
संपादकीय: न्यूनतम समर्थन मूल्य का मुद्दा, आंदोलनकारी किसानों से बातचीत जल्दी क्यों नहीं
जगजीत सिंह डल्लेवाल (डिजाइन फोटो)
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नवभारत डेस्क: गत 26 नवंबर से आमरण अनशन कर रहे किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के बिगड़ते स्वास्थ्य के बावजूद 55 दिनों से सरकार उनकी उपेक्षा कर रही थी लेकिन अब उन्हें आश्वासन दिया गया है कि सरकार 14 फरवरी को उनसे बातचीत करेगी। आखिर चर्चा के लिए इतना विलंब क्यों किया जाना चाहिए?

यदि सरकार कृषि उत्पादों के बाजार मूल्य और एमएसपी के बीच के अंतर की रकम किसानों को दे तो भी केवल 27,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे जो कि जीडीपी का 0.1 प्रतिशत है। 2022-23 में उद्योगों को 2.08 लाख करोड़ रु। कर्ज और 1.09 लाख करोड़ रु. टैक्स छूट दी गई थी। क्या ऐसी ही उदारता किसानों के साथ नहीं दिखाई जा सकती? किसानों का आंदोलन बेवजह नहीं है।

देश की लगभग 60 फीसदी कृषि मानसूनी बारिश पर निर्भर है। बीज, उर्वरक, कीटनाशक व कृषि उपकरण महंगे हो गए हैं। इस्पात व सीमेंट के दाम बढ़ने पर सरकार उसका आयात नहीं करती लेकिन अनाज, तिलहन, शक्कर और दालों के दाम बढ़ने पर विदेश से आयात किया जाता है। यह बात स्पष्ट है कि देश में खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। इसलिए स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी पर खरीदी होनी चाहिए।

यदि हर फसल के लिए एमएसपी देना संभव न हो तो किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करनी चाहिए। अभी प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत भूमिधारक किसान को 6,000 रुपए वार्षिक दिए जाते हैं। महंगाई को देखते हुए यह रकम अपर्याप्त है जिसे प्रति हेक्टेयर जमीन के हिसाब से तय करते हुए बढ़ाया जा सकता है।

किसानों को कृषि के साथ ही पशुपालन, मछली पालन, कुक्कुट पालन, मधुमक्खी पालन जैसी संलग्न व्यवसाय सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तो उनकी आर्थिक समस्या हल होगी। किसानों से यह भी कहा जा सकता है कि वो बाजार की मांग वाली फसलें पैदा करें। उन्हें लाभप्रद मूल्य उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। गत वर्ष फरवरी से पंजाब और हरियाणा के किसान सभी फसलों के लिए एमएसपी की मांग के साथ दिल्ली पहुंचने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।

केंद्र सरकार को जो भी कदम उठाना है, वह किसानों को विश्वास में लेकर उठाना चाहिए। पिछली बार जल्दबाजी में 3 कृषि कानून पारित किए गए थे जिनमें किसानों से सीधे फसल खरीदने का प्रावधान था। जब इसके विरोध में आंदोलन तीव्र हुआ तो सरकार ने आनन-फानन में वह कानून रद्द कर दिए थे। किसानों पर कर्ज का बोझ, उनकी आत्महत्या जैसे मुद्दों से सरकार अवगत है। वह यथाशीघ्र ऐसे प्रस्तावों के साथ चर्चा करे जिनसे किसानों का हित साध्य हो सके।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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