नवभारत संपादकीय: डॉलर के मुकाबले रुपया 94.82 तक गिरा, बाजार में मचा हाहाकार

Rupee vs Dollar: डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 94.82 तक गिर गया। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, पश्चिम एशिया तनाव और विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बाजार पर दबाव बढ़ गया है।
Navabharat Editorial: Rupee Slumps to 94.82 Against the Dollar; Market Thrown into Turmoil
Indian Rupee Record Fall ( Source: Social Media )
Updated on

Indian Rupee Record Fall: गत शुक्रवार को रुपया बुरी तरह लुढ़क गया। पहली बार 94.82 रुपये बराबर 1 डॉलर की ऐतिहासिक गिरावट देखी गई। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों तथा खाड़ी युद्ध समाप्त होने के आसार नजर नहीं आने की वजह से रुपये पर बुरा असर पड़ा।

पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर बनी अनिश्चितताओं के बीच अमेरिकी डॉलर मजबूत होने से रुपये पर दबाव आया है और वह 95 रुपये को भी पार कर सकता है।

रुपये में गिरावट और विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने बाजार की धारणा को कमजोर किया है। शेयर मार्केट में जबर्दस्त गिरावट से हाहाकार मच गया है।

यद्दापि भारत सरकार व भारतीय रिजर्व बैंक ने 2020 से पर्याप्त समन्वय दिखाया है फिर भी प्रश्न यह है कि क्या रुपये का वर्तमान मूल्य भारत के मैक्रो फंडामेंटल को दर्शाता है।

रुपये के मूल्य में वित्त वर्ष 2026 में आई गिरावट 2011 से 2014 के बीच 3 वर्षों में आई गिरावट की याद दिलाती है, तब अर्थव्यवस्था की बुनियादी कमजोरी सामने आई थी।

इस समय रुपये के इतने कमजोर होने की क्या वजह है? वित्त वर्ष 2026 में 16.4 अरब डॉलर विदेशी निवेशकों ने निकाल लिए, मार्च में ही 13 अरब डॉलर की बिक्री हुई।

यह पिछले 28 वर्षों में सबसे बड़ा पोर्टफोलियो आउटफ्लो है। 1991 के बाद में पहली बार पूंजी खाते और चालू खाते में ऐसी घाटे की स्थिति है। इस स्थिति के बावजूद भारत के माल निर्यात और सेवाओं में 6 प्रतिशत्त विस्तार हुआ। आयात में 20 प्रतिशत वृद्धि हो जाने से व्यापार घाटा 90 अरब डॉलर से बढ़कर 110 अरब डॉलर पर जा पहुंचा। आगे भी निर्यात की बजाय आयात बढ़ेगा।

कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चले जाने से आयात बिल बढ़ा है। इतने पर भी रिजर्व बैंक के पास लगभग 700 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा है। वह कभी भी फोरेक्स मार्केट में हस्तक्षेप कर सकता है।

ब्याजदरों में पर्याप्त तरलता (लिक्विडिटी) सुनिश्चित कर रिजर्व बैंक ने उचित कदम उठाया। अब रुपये की मजबूती वापस लाने के लिए विदेश में रहने वाले 3.50 करोड़ भारतीयों को बॉन्ड बेचे जा सकते हैं।

यदि डॉलर के विकल्प के तौर पर ब्रिक्स देश अपनी मुद्राओं में व्यापार करते हैं तो इस संभावना पर भी सावधानी से विचार करना होगा। वर्तमान स्थिति में विकास को लेकर लगाए गए अनुमान नीचे जा सकते हैं।

अगले वर्ष व्याजदरें बढ़ने की संभावना है। सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर तेल कंपनियों को राहत दी है। ईरान शांति वार्ता में प्रगत्ति होने तक डॉलर के मुकाबले रुपया 93.25 से लेकर 94.25 के बीच झूलता रहेगा।

खाड़ी युद्ध की वजह से सारी दुनिया संकट झेलने को मजबूर है। रुपये में लगातार गिरावट को रोकने के लिए रिजर्व बैंक ने देश के बैंकों को निर्देश दिया है कि चाह 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा अपने पास नहीं रख सकेंगे।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

Navbharat Live
navbharatlive.com