पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, BJP ने बाहर से आए 106 लोगों को टिकट दिया

NB-Vishesh
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ऊपर से थोपे जाने वाले प्रत्याशियों को लेकर बीजेपी के समर्पित कार्यकर्ताओं में रोष है, भले ही पार्टी अनुशासन से बंधे होने के कारण उनमें से अधिकतर खामोश रहने को प्राथमिकता देते हों। कोई भी व्यक्ति जब किसी पार्टी का फुल-टाइम कार्यकर्ता बनता है, तो उसके दिल में यह सपना अवश्य होता है कि एक दिन उसे भी जनप्रतिनिधि बनने का अवसर मिलेगा। लेकिन जब उसकी पार्टी ऊपर से किसी फिल्मी सितारे, किसी नामचीन क्रिकेटर या दल बदलकर दूसरी पार्टी से आए नेता को ऊपर से प्रत्याशी के रूप में थोप देती है, तो वह ठगा सा महसूस करता है। उसे लगता है कि उसके अवसर को जबरन छीन लिया गया है। यह एहसास तब भी होता है, जब दलगत समझौते के तहत उसके चुनाव क्षेत्र को अन्य पार्टी के

परायों को उम्मीदवारी दी

दल बदलुओं का अपनी नई पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ना भारत की राजनीति में कोई नई बात नहीं है लेकिन वर्तमान लोकसभा चुनाव में जिस बड़े पैमाने पर बीजेपी यह कर रही है, वह अप्रत्याशित है। बीजेपी ने प्रत्याशी केवल अपने प्रतिद्वंद्वी दलों जैसे कांग्रेस, तृणमूल, झारखंड मुक्ति मोर्चा आदि से ही आयात नहीं किए हैं बल्कि अपने सहयोगी दलों जैसे टीडीपी से भी आयात किए हैं। इनमें से कुछ तो चुनाव की घोषणा होने के बाद या अपनी मूल पार्टी से टिकट न मिलने पर बीजेपी में शामिल हुए थे। तेलंगाना में जो बीजेपी के 11 आयातित प्रत्याशी हैं, उनमें से 6 ऐसे ही हैं। यह सही है कि आंध्रप्रदेश, तेलंगाना व दक्षिण के अन्य राज्यों (कर्नाटक को छोड़कर) में बीजेपी की उपस्थिति सीमित ही रही है, जिस कारण आयात करना मजबूरी भी हो सकती है, लेकिन यह बात समझ से परे है कि हरियाणा, जहां पिछले एक दशक से उसकी राज्य सरकार है, में भी उसने 10 में से 6 आयातित उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।

इनमें से 2 नवीन जिंदल व अशोक तंवर ने इन चुनावों की गहमा- गहमी के दौरान ही बीजेपी का पट्टा अपने गले में डाला है। पंजाब में भी बीजेपी के आधे से अधिक (13 में से 7) प्रत्याशी आयातित हैं। इसकी एक मुख्य वजह यह है कि इनमें से अधिकतर लोग अमरिंदर सिंह के साथ कांग्रेस से निकले थे और फिर अमरिंदर सिंह ने अपनी नवगठित पार्टी का विलय बीजेपी में कर लिया था।

खाते में डाल दिया जाता है। यह समस्या लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों में है, लेकिन इस समय बीजेपी में सबसे अधिक है। वर्तमान चुनाव में बीजेपी ने जो कुल 435 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, उनमें से 106 या लगभग एक चौथाई यानी 24 प्रतिशत ऐसे हैं, जो दूसरी पार्टियों से 'आयातित' हैं। यह 106 प्रत्याशी 2014 के बाद बीजेपी में शामिल हुए हैं और इनमें से 90 तो पिछले 5 वर्षों के दौरान उसके सदस्य बने हैं। आंध्रप्रदेश में बीजेपी 6 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिनमें से 5 आयातित प्रत्याशी हैं। इसी तरह तेलंगाना में उसके 17 में से 11 उम्मीदवार आयातित हैं यानी पार्टी के मूल सदस्य नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में 74 में से 23 प्रत्याशी आयातित हैं। बंगाल में भी बीजेपी के 42 में से 10 प्रत्याशी आयातित हैं।

UP में 23 आयातित प्रत्याशी

सबसे अधिक चौंकाने वाला राज्य उत्तर प्रदेश है जहां पिछले एक दशक के दौरान लोकसभा व विधानसभा के सभी चुनावों में बीजेपी का जबरदस्त दबदबा रहा है, फिर बीजेपी की ऐसी क्या मजबूरी रही कि उसने अपने 74 प्रत्याशियों में से 23 (31 प्रतिशत) को आयात करके मैदान में उतारा? क्या दल-बदल इसी शर्त पर कराया गया था कि उन्हें प्रत्याशी बनाया जाएगा? आयातित प्रत्याशियों का प्रतिशत ओडिशा (29 प्रतिशत) या तमिलनाडु (26 प्रतिशत) जैसे राज्यों में समझ में आता है क्योंकि ये बीजेपी के परंपरागत गढ़ नहीं हैं, महाराष्ट्र में भी 25 प्रतिशत आयातित प्रत्याशियों की बात समझ में आती है कि इस राज्य की राजनीति में पिछले 5 वर्षों में जबरदस्त उठापटक हुई है, लेकिन उत्तर प्रदेश का प्रतिशत आश्चर्य में डालता है।

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