नवभारत संपादकीय: रामलीला मैदान में विपक्ष की ताकत का प्रदर्शन, क्या वोटों में बदलेगी भीड़?

Congress India Alliance Rally: रामलीला मैदान में कांग्रेस और INDIA गठबंधन की रैली ने विपक्षी एकजुटता का संदेश दिया। अब सवाल है कि क्या यह शक्ति प्रदर्शन जनता के समर्थन और चुनावी वोटों में बदल पाएगा?
Ramlila Maidan Rally and Opposition Strategy
रामलीला मैदान कांग्रेस रैलीफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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Highlights

  • रामलीला मैदान की रैली में इंडिया गठबंधन ने एकजुटता दिखाई।

  • सवाल है कि क्या रैली की भीड़ वोटों में बदल पाएगी?

  • मॉक पार्लियामेंट को गठबंधन की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बताया गया है।

  • एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच टकराव तेज हुआ है।

Ramlila Maidan Rally and Opposition Strategy: दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के नेतृत्व में विशाल नि रैली कर विपक्ष के इंडिया गठबंधन ने अपनी एकजुटता और सम्मिलित शक्ति की बानगी पेश की, लेकिन क्या उसके आंदोलनकारी तेवर चुनाव में उसकी जीत सुनिश्चित कर पाएंगे? क्या यह भीड़ वोटों में रूपांतरित हो पाएगी? इस मैदान में रैलियां पहले भी होती रही हैं। 1975 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन की रैली, इसके बाद इमरजेंसी हटने पर 1977 में मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह व जगजीवन राम व अटलबिहारी वाजपेयी की कांग्रेस विरोधी रैली, 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में इंडिया अगेंस्ट करप्शन की रैली हुई।

कांग्रेस व इंडिया गठबंधन की वोट बचाओ-संविधान बचाओ रैली तथा मॉक पार्लियामेंट के जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग लाना दिखाता है कि अब स्पष्ट रूप से बीजेपी नेतृत्व के एनडीए और कांग्रेस नेतृत्व के इंडिया गठबंधन के बीच सीधे टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास के लॉन पर पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की अध्यक्षता में हुई मॉक पार्लियामेंट लोगों को भले ही नाटकीय लगी, लेकिन यह इंडिया गठजोड़ की सधी हुई रणनीति का एक भाग है। इसके जरिए वह देश के जनमन को आंदोलित करना चाहती है।

बंगाल में ममता की रणनीति और विपक्ष की एकजुटता पर सवाल

'वोट चोरी अभियान से ममता बनर्जी को बंगाल में अपना खोया हुआ आधार पुनः हासिल करने की उम्मीद है। दूसरी ओर कांग्रेस भी टीएमसी से तालमेल कर बंगाल में प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर सकती कांग्रेस की उपेक्षा करने वाली ममता ने जब सोनिया गांधी को अपना नेता बताया, तो लगा कि नेता किस तरह रंग बदलते हैं।

क्या विपक्ष के पास इतने संसाधन हैं कि वह राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का मुकाबला कर सके ? भीड़ को देखकर भ्रमित नहीं होना चाहिए, गत वर्ष राहुल गांधी ने बिहार में एसआईआर के विरोध में वोटर अधिकार यात्रा निकाली थी जिसने 20 जिलों में 1,300 किलोमीटर की दूरी तय की थी। इसके बाद पटना के गांधी मैदान में विशाल रैली की गई थी, लेकिन 61 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने के बाद विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 6 सीटें जीत पाई थी।

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वोट चोरी के आरोपों से आगे कांग्रेस को मजबूत रणनीति की जरूरत

बिहार में नीतीश कुमार का हर महिला को 10,000 रुपये देने का वादा असर कर गया, बीजेपी के पास भी लुभावने चुनावी वादों की कमी नहीं है। इसलिए वोट चोरी का आरोप लगाकर विपक्ष कितनी मजबूती हासिल कर पाएगा? इसके लिए और भी कदम उठाने होंगे, कप्ग्रेस ने विधानसभा चुनाव से एक माह पहले तेलंगाना में दलितों और आदिवासियों को साथ जोड़ा तथा पृथक तेलंगाना राज्य आंदोलन से जुड़े नेताओं को साथ लिया तब उसे सफलता मिली थी।

कांग्रेस वोट चोरी के आरोप के तहत चुनाव आयोग के साथ ही सरकार व बीजेपी को भी लपेटने में लगी है, लेकिन वह इस वास्तविकता को नजरअंदाज कर रही है कि चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति पर उसके कार्यकाल के दौरान कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा