नवभारत विशेष: BRICS की नई विश्व व्यवस्था? दिल्ली से बदलेगी ग्लोबल पावर की तस्वीर

New World Order: दिल्ली में BRICS नेताओं की बैठक नई विश्व व्यवस्था की दिशा में अहम मानी जा रही है। पुतिन व PM मोदी के बयानों में वैश्विक शक्ति, अर्थव्यवस्था और ग्लोबल साउथ की बढ़ती भूमिका की झलक दिखी।
BRICS Alternative World Order
मोदी-जिनपिंग संवादफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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BRICS Alternative World Order: दिल्ली में जुटे ब्रिक्स के नेता सिर्फ एक संगठन की बैठक नहीं कर रहे, वे उस दुनिया का एक वैकल्पिक खाका खींचने की कोशिश कर रहे हैं, जो अब एक ध्रुवीय नहीं रही। सवाल यह नहीं है कि ब्रिक्स अमेरिका को चुनौती देगा या नहीं, असली सवाल यह है कि क्या चीन, भारत, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और संगठन के दूसरे साझेदार अपने अलग-अलग हितों के बावजूद ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था बना पाएंगे, जिसमें सत्ता, व्यापार, पैसा और निर्णय लेने की ताकत पश्चिमी संस्थाओं के हाथ से निकलकर ग्लोबल साउथ के हाथों में आ जाए।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने कहा, 'पश्चिम अब कमजोर हो रहा है, फिर भी पता नहीं ये देश खुद को जी-7 क्यों कहते हैं? दुनिया की 40 फीसदी से ज्यादा जीडीपी ब्रिक्स देशों से आती है, जबकि जी 7 देशों की वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी सिर्फ 29 फीसदी है। इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि आज 11 सदस्य देशों वाले ब्रिक्स में दुनिया की आधी आबादी रहती है। साथ ही अगर अर्थव्यवस्था की बात करें तो ब्रिक्स देशों के पास वैश्विक अर्थव्यवस्था की अकेले 39 फीसदी परचेजिंग पावर है, जो कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मुकाबले 3 गुना से भी ज्यादा है। इस तरह देखें तो चाहे रूसी राष्ट्रपति पुतिन हों या भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दोनों के ही संबोधन में कहीं न कहीं नई विश्व व्यवस्था की झलक दिख रही थी।

BRICS की ताकत और चुनौती

ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन के साथ हुई थी और फिर इसमें दक्षिण अफ्रीका भी आ जुटा, जिसके बाद यह ब्रिक से 'ब्रिक्स' बना। इसके बाद हुए विस्तार ने इसे 11 सदस्यीय समूह में बदल दिया। आज इस वैश्विक संगठन में एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण अमेरिका की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। इसकी महत्वाकांक्षा, वैश्विक शासन की संरचना पर असर डालने की है। ब्रिक्स की चर्चा में आम तौर पर सबसे ज्यादा ध्यान लोगों की मांग के बावजूद डायरेक्टरी नहीं छापी गई, ग्राहकों के नंबर बदले गए। इससे संपर्क करना मुश्किल हो गया था।

मज़बूरन लोगों ने लेडलइन कनेक्शन कटवा दिया, यह धारणा व्याप्त होने लगी कि उनके कर्मचारी काम नाहीं करते डॉलर पर केंद्रित होता है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने, सीमा पार भुगतान की वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करने और पश्चिमी वित्तीय ढांचे पर निर्भरता कम करने के संकेत हैं। यहां सावधानी जरूरी है, क्योंकि ब्रिक्स की अपनी साझा मुद्रा बन जाना और डॉलर का तत्काल विकल्प तैयार हो जाना, फिलहाल दो अलग-अलग बातें हैं।

ब्रिक्स की वास्तविक उपलब्धि शायद डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि दुनिया को भुगतान और वित्त के अधिक विकल्प देना होगा। ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी एक ही जगह दिखाई देती है और यह है चीन और भारत के रिश्ते। दरअसल चीन और भारत साझेदार भी हैं और प्रतिस्पधीं भी।

BRICS की ताकत भारत-चीन रिश्तों पर टिकी

दोनों ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं और दोनों ही ग्लोबल साउथ की आवाज बनने का दावा करते हैं। साथ ही दोनों ब्रिक्स को मजबूत भी करना चाहते हैं, लेकिन दोनों के रणनीतिक हित हमेशा एक जैसे नहीं रह पाते। भारत और चीन का सीमा विवाद, हिंद प्रशांत में शक्ति संतुलन, व्यापार असंतुलन और एशिया में प्रभाव की प्रतिस्पर्धा ही वह स्थिति है, जो दोनों के संबंधों को जटिल बनाती है। हालांकि भारत कई बार अपनी तरह से इस जटिलता को कम करने की कोशिश करता है, लेकिन ज्यादातर मौकों पर चीन विश्वसनीय साबित नहीं होता।

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अगर भारत और चीन के बीच रिश्तों को लेकर विश्वसनीयता आ जाए तो ब्रिक्स देखते ही देखते हर मायने में जी-7 पर भारी पड़ेगा। यदि भारत और चीन अपने मतभेदों के बावजूद कुछ साझा वैश्विक मुद्दों पर निरंतर सहयोग कर सकते हैं, तो ब्रिक्स की मोदी-जिनपिंग संवाद का महत्व सिर्फ भारत और चीन के आपसी रिश्तों तक सीमित नहीं है। इसका असर ब्रिक्स की भविष्य की दिशा पर भी पड़ता है।

लेख-डॉ. अनिता राठौर के द्वारा

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