नवभारत संपादकीय: पाखंडी बाबाओं के जाल में क्यों उलझे नेता? महाराष्ट्र राजनीति में हलचल

Baba Scandal Politics: स्वयंभू बाबा अशोक खरात के खिलाफ महिलाओं के शोषण, ब्लैकमेलिंग और फिरौती मांगने के आरोपों ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।
Navabharat Editorial: Why Do Politicians Get Entangled in the Web of Fraudulent 'Babas'? — Turmoil in Maharashtra Politics
Ashok Kharat Baba Scandal ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Ashok Kharat Baba Scandal: विस्मयजनक है कि बड़े राजनेता व मंत्री क्यों पाखंडी वि तांत्रिकों और बाबाओं से इतनी निकटता रखते हैं? मुख्यमंत्री, मंत्री व उच्चपदों पर रह चुके लोग जब ऐसा करते हैं तो देखादेखी सामान्य व्यक्ति भी ऐसे चरित्रहीन जालसाज बाबा के जाल में फंस जाता है।

स्वयं को कैप्टन कहनेवाले अशोक खरात नामक लम्पट बाबा के काले कारनामों ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। पति की मृत्यु का भय दिखाकर एक महिला से दुष्कर्म करनेवाले खरात के लगभग 58 अश्लील वीडियो सामने आए हैं।

वह धार्मिक आस्था और दैवीय शक्ति के नाम पर महिलाओं को अपने जाल में फंसाकर उनका यौन शोषण करता था इसके साथ ही ब्लैकमेलिंग व जबरन वसूली भी करता था।

अब तक खरात के खिलाफ 3 एफआईआर दर्ज हुई हैं। अश्लील वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उसने 5 करोड़ रुपए की फिरौती मांगी।

यूबीटी प्रवक्ता संजय राऊत ने खरात प्रकरण की तुलना अमेरिका की एपस्टीन फाइल से की है। एकनाथ शिंदे, विखे पाटिल और महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर भी अशोक खरात के भक्त बताए जाते हैं।

क्या उच्चपदस्थ लोगों में भले-बुरे की पहचान करने का विवेक नहीं है? ऐसा लगता है कि राजनीति में व्याप्त असुरक्षा, ऊंची कुर्सी पाने की लालसा और कालेधन को सफेद बनाने की कोशिश नेताओं को ऐसे तांत्रिकों के पास ले जाती है।

अपनी कुर्सी टिकाए रखने, प्रतिद्वंदियों को मात देने की मानसिकता लेकर वह ऐसे ढोंगी बाबाओं की चरणवंदना करते हैं। यदि संयोग से उन्हें कोई सफलता मिल गई तो उसे बाबा की कृपा मानकर उसके अंधभक्त बन जाते हैं।

सत्ता व धन के मोहपाश में जकड़े नेता यह नहीं सोचते कि वह किस दुष्चरित्र को गुरु की तरह सम्मान दे रहे हैं, कितने आचर्य की बात है कि राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर इस कथित कैप्टन के शिवनिका संस्थान ट्रस्ट की संचालक हैं।

महिलाओं की रक्षा के लिए जिम्मेदार आयोग की प्रमुख का एक पाखंडी बाबा का संरक्षक बनना किसी पहेली के कम नहीं है। बाबाओं के प्रति आस्था रखना व्यक्तिगत मामला है लेकिन यह भी तो देखना चाहिए कि वह वास्तव में तपस्वी-त्यागी है या नहीं? कहीं विषय वासना का कीड़ा तो नहीं है? स्व. विलासराव देशमुख भैयूजी महाराज के भक्त थे।

दूसरों को परामर्श देनेवाले भैयूजी ने विवाहेतर संबंधों के कारण खुद बदनामी के भय से आत्महत्या कर ली थी। पूर्व सांसद छत्रपति संभाजी राजे ने सही कहा था कि छत्रपति शिवाजी महाराज, शाहू महाराज, महात्मा फुले व डॉ. आंबेडकर के महाराष्ट्र में इस तरह की घटनाएं सामने आना हैरान करनेवाली बात है।

अंधश्रद्धा विरोधी कानून लागू होने के बावजूद सरकार में शीर्ष पदों पर बैठे लोग खरात के पास जाते थे। यह सफाई देने में कोई मतलब नहीं है कि हम सिर्फ दर्शन के लिए गए थे।

गांव-गांव में ढोंगी बाबा नेताओं की मिलीभगत से पनप रहे हैं। जनता क्यों नहीं ऐसे नेताओं से स्पष्टीकरण मांगती? वैज्ञानिक व तर्कसंगत सोच की बजाय पाखंडियों को प्रोत्साहन क्यों दिया जाता है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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