

Why Three People Avoided Together:अक्सर आपने अपने घर के बड़े-बुजुर्गों को कहते सुना होगा कि किसी शुभ काम के लिए तीन लोग एक साथ नहीं जाने चाहिए। यही वजह है कि वर्षों से एक कहावत भी प्रचलित है- 'तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा'। लेकिन क्या यह केवल अंधविश्वास है या इसके पीछे कोई पारंपरिक सोच और धार्मिक मान्यता भी छिपी हुई है? आइए जानते हैं कि आखिर इस कहावत की शुरुआत कैसे हुई और इसके पीछे क्या कारण बताए जाते हैं।
लोक मान्यताओं के अनुसार, यह कहावत केवल डर या अंधविश्वास पर आधारित नहीं है। प्राचीन समय में इसे लोगों को सावधानी बरतने और शुभ कार्यों में अनावश्यक बाधाओं से बचाने के लिए एक सांकेतिक संदेश के रूप में माना जाता था। माना जाता था कि यदि यात्रा या महत्वपूर्ण कार्य के दौरान लोगों का ध्यान भटके या आपसी मतभेद पैदा हो जाए, तो काम प्रभावित हो सकता है।
भारतीय परंपराओं में कई स्थानों पर तीन अंक से जुड़ी विशेष मान्यताएं देखने को मिलती हैं। यही कारण है कि कुछ लोग आज भी किसी की थाली में एक साथ तीन रोटियां नहीं परोसते। इसी तरह पूजा-पाठ में तीन लोगों का एक साथ बैठना, या विवाह के लिए रिश्ता देखने तीन लोगों का जाना भी कई परिवारों में उचित नहीं माना जाता। हालांकि यह मान्यता हर जगह एक जैसी नहीं है, लेकिन लोक परंपराओं में इसका उल्लेख मिलता है।
पुराने समय में लंबी यात्राएं पैदल या बैलगाड़ी से की जाती थीं और रास्ते भी कठिन होते थे। ऐसे में यात्रियों का पूरा ध्यान रास्ते और लक्ष्य पर बना रहे, इसके लिए कई सामाजिक नियम बनाए गए। माना जाता था कि तीन लोगों के समूह में चर्चा, मतभेद या निर्णय को लेकर भ्रम की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए शुभ कार्यों के लिए दो या चार लोगों का साथ अधिक उचित माना गया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुछ देवी-देवताओं की पूजा में तीन परिक्रमा करने का विधान नहीं बताया जाता। इसी तरह कई पारंपरिक मान्यताओं में तीन रोटियां एक साथ परोसने या शुभ कार्य में केवल तीन लोगों की उपस्थिति से बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इन मान्यताओं में अंतर भी देखने को मिलता है।
ज्योतिष और धर्मग्रंथों में ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम नहीं मिलता कि तीन का अंक हमेशा अशुभ ही होता है। अधिकतर विशेषज्ञों का मानना है कि 'तीन तिगाड़ा, काम बिगाड़ा' जैसी कहावतें लोक परंपराओं और सामाजिक अनुभवों से जुड़ी हुई हैं। इसलिए इन्हें आस्था और परंपरा के रूप में देखा जा सकता है, न कि हर परिस्थिति में लागू होने वाले निश्चित नियम के रूप में।