

Varaha Jayanti Kab Hai: जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए समय-समय पर अनेक अवतार लिए। इन्हीं दिव्य अवतारों में से एक है वराह अवतार। वराह जयंती हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है।
धार्मिक ग्रथों में बताया गया है कि, वराह जयंती का पर्व भगवान विष्णु के वराह अवतार के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं इस साल कब वराह जयंती किस दिन मनाई जाएगी ?
पंचांग के अनुसार, वराह जयंती हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाई जाती है। इस वर्ष 2026 में यह तिथि 13 सितंबर, रविवार को पड़ रही है।
तृतीया तिथि का आरंभ 13 सितंबर 2026 को सुबह 7:08 बजे होगा और इसका समापन 14 सितंबर को सुबह 7:08 बजे होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की पूजा करने से भक्तों को भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
भगवान वराह की पूजा के लिए दोपहर का समय शुभ माना जाता है। साल 2026 में भगवान वराह की पूजा के लिए पूजा का शुभ समय दोपहर 1:30 बजे से शाम 4:00 बजे तक बताया गया है।
वराह जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें ।
साफ-सुथरे कपड़े पहनकर व्रत या पूजा का संकल्प लें।
इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
सबसे पहले भगवान वराह का ध्यान करके पूजा का संकल्प लें।
जल से भरे कलश को पूजा स्थान पर स्थापित करें।
उसके पास भगवान वराह की तस्वीर या प्रतिमा रखें।
भगवान विष्णु के वराह स्वरूप का पंचामृत से अभिषेक करें।
इसके बाद भगवान को पीले वस्त्र और पीले फूल अर्पित करें।
भगवान को मिष्ठान्न, फल और अन्य नैवेद्य अर्पित करें।
दीपक और धूप जलाकर भगवान विष्णु की आरती करें।
पूजा के दौरान ‘ॐ वाराहाय नमः’ मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें।
अंत में भगवान विष्णु से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।
भगवान विष्णु के तीसरे अवतार भगवान वराह के प्रकटोत्सव के रूप में वराह जयंती का पर्व मनाया जाता है। यह जयंती भगवान विष्णु की शक्ति और उनके रक्षक स्वरूप की याद दिलाने वाला महत्वपूर्ण पर्व बताया गया है।
धार्मिक मान्यता है कि,इस दिन सच्चे मन और नियमपूर्वक भगवान वराह की पूजा करने से जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होती हैं और भगवान विष्णु की कृपा भक्तों पर सदैव बनी रहती हैं। इसके अलावा, यह पर्व हमें ये भी संदेश देता है कि जब-जब धरती पर अधर्म और अराजकता बढ़ती है, तब-तब धर्म और सत्य की रक्षा के लिए ईश्वर किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं।