

Premanand Maharaj Words: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर इंसान सुख और शांति की तलाश में है। लेकिन श्री प्रेमानन्द जी महाराज के अनुसार, असली आनंद भौतिक सुखों में नहीं, बल्कि भगवद भक्ति में छिपा है। उनका कहना है कि मनुष्य का यह जीवन बेहद दुर्लभ है, जिसे देवता भी आसानी से प्राप्त नहीं कर सकते। वे बताते हैं कि देवताओं के पास वैभव तो है, लेकिन भगवनानंद का अनुभव उन्हें नहीं मिलता, जो इंसान इस जन्म में पा सकता है।
आज का इंसान भोगानंद यानी भौतिक सुखों में उलझा हुआ है, लेकिन इससे कभी संतुष्टि नहीं मिलती। संत प्रेमानंद जी कहते हैं कि असली सुख वैराग्य और त्याग में है। वे यह भी बताते हैं कि उनकी साधना का श्रेय उन्हें नहीं, बल्कि उनके गुरु और इष्ट देव की कृपा को जाता है। जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही गुरु की कृपा इंसान को महान बना देती है।
श्री वृंदावन धाम को संत प्रेमानंद जी अत्यंत प्रेम और वात्सल्य का केंद्र मानते हैं। उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति वहां नहीं जा सकता, तो कम से कम रोज एक बार उसका ध्यान जरूर करे। वे सलाह देते हैं कि निरंतर "राधा राधा" नाम का जप करने से मन शुद्ध होता है और भगवान की प्राप्ति आसान हो जाती है।
संत प्रेमानंद जी का एक महत्वपूर्ण संदेश है "यदि आप दिन भर में केवल 24 मिनट भी राधा राधा बोलेंगे, तो भगवद प्राप्ति पक्की है।" वे कहते हैं कि भगवान को पाना मुश्किल नहीं, बल्कि माया के पीछे भागना ज्यादा कठिन और व्यर्थ है। यह मार्ग इतना सरल है जैसे "परोसा हुआ भोजन", जिसे बस स्वीकार करना है।
भक्ति का असली अर्थ दिखावे में नहीं, बल्कि मन की भावना में है। बाहर से किए गए दान-पुण्य सीमित फल देते हैं, लेकिन अंदर से लिया गया भगवान का नाम कभी नष्ट नहीं होता। अगर कोई व्यक्ति बाहर से कुछ भी न करे, लेकिन भीतर से राधा राधा जपता रहे, तो उसकी साधना पूर्ण मानी जाती है।
संत प्रेमानंद जी बताते हैं कि गुरु का दंड भी हमारे लिए कल्याणकारी होता है। यह हमारे अहंकार को खत्म करता है और हमें शुद्ध बनाता है।
अंत में वे कहते हैं कि चाहे व्यक्ति कितना भी पापी क्यों न हो, अगर उसकी जिह्वा पर हरि या राधा नाम है, तो वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकता है।