

Kajari Teej Vrat Katha : हिंदू धर्म में पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य और परिवार में सुख-शांति की कामना के लिए तीज का व्रत रखा जाता है। वर्षभर में कुल तीन तीज मनाई जाती है इन्ही में से कजरी तीज का व्रत भी। जो हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। इस बार कजरी तीज का व्रत आज 31 अगस्त, सोमवार को रखा जा रहा है।
धार्मिक मान्यता है कि, इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से दांपत्य जीवन में सौभाग्य, प्रेम और अटूट बंधन बना रहता है। यह त्योहार रक्षाबंधन के तीन दिन बाद और कृष्ण जन्माष्टमी से पाँच दिन पहले आता है।
पौराणिक मान्यताओं और कथाओं के अनुसार, कजरी तीज का सबसे पहला व्रत माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए रखा था। ऐसा माना जाता है कि माता पार्वती ने 107 जन्मों तक तप किया और 108वें जन्म में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था।
कहते हैं कि तभी से इसी पवित्र मिलन के बाद सुहागिन महिलाओं के बीच पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए तीज व्रत की परंपरा शुरू हुई। ये पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम, समर्पण और पुनर्मिलन का प्रतीक माना जाता है।
कजरी तीज के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें।
इसके बाद विधिवत पूजा आरंभ करें।
कजरी तीज के दिन भगवान शिव, माता पार्वती की पूजा करने के साथ नीमड़ी माता की पूजा करें।
पूजन से पहले मिट्टी और गोबर से दीवार के सहारे एक तालाक जैसी आकृति बना लें और उसके आसपास नीम की टहनी लगा दें।
इसके बाद तालाब में कच्चा दूध और जल डाल लें। अब नीमड़ी माता को जल, रोली और अक्षत चढ़ाएं।
इसके बाद नीमड़ी माता के पीछे दीवार पर मेहंदी, रोली, काजल लगा दें।
इसके बाद वस्त्र चढ़ा दें इसके साथ ही फूल, माला, मिठाई, फल के सात कुछ पैसे चढ़ा दें।
इसके साथ ही पूजा स्थल में बने तालाब के किनारे दीपक जला दें।
इसके साथ ही इस तालाब में नींबू, ककड़ी, नाक की नथ, साड़ी रख दें।
इसके साथ ही माता पार्वती और भगवान शिव की विधिवत पूजा करें और माता को सोलह श्रृंगार जरूर अर्पित करें।
शाम को चंद्रमा देखने के बाद अर्घ्य दे दें और अपना व्रत खोल लें।
सुहागिन महिलाओं के लिए कजरी तीज का विशेष महत्व होता है। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने के से दांपत्य जीवन में मजबूती आती है और सुख-समृद्धि का वास होता है। इस दिन विवाहित महिलाएं सोलह श्रृंगार करके व्रत करती हैं, जो सौभाग्य और समर्पण का प्रतीक है। इस पर्व पर गीत-संगीत और लोक नृत्य का भी विशेष महत्व है, जिसमें महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनकर झूला झूलती हैं और कजरी गीत गाती हैं।