रावण इतना शक्तिशाली होकर भी माता सीता को क्यों नहीं छू सका? रामायण से जुड़ा रहस्य जानकर चौंक जाएंगे

Ravan Sita Rahasya: जब भगवान श्रीराम अपनी पत्नी माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों के वनवास पर गए, तब उनके जीवन में कई कठिनाइयां आईं। इसी दौरान लंकापति रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण किया था
Despite being so powerful, why couldn't Ravana touch Mother Sita You will be shocked to learn this secret from the Ramayana.
Ravan and Sita (Source. Pinterest)
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Ramayan Ki Kahani के अनुसार, जब भगवान श्रीराम अपनी पत्नी माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों के वनवास पर गए, तब उनके जीवन में कई कठिनाइयां आईं। इसी दौरान लंकापति रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण कर लिया और उन्हें लंका ले जाकर अशोक वाटिका में कैद कर दिया। इसके बाद प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी और सुग्रीव की वानर सेना के साथ मिलकर लंका पर चढ़ाई की, रावण का वध किया और माता सीता को मुक्त कराया। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि माता सीता को महीनों तक बंदी बनाकर रखने के बावजूद रावण उन्हें छू तक क्यों नहीं सका? इसके पीछे रामायण में वर्णित एक गहरा कारण छिपा है।

विद्वान रावण भी नहीं टाल सका अपना श्राप

रावण सभी वेदों का ज्ञाता, महान विद्वान और अपार शक्तियों का स्वामी था। लेकिन अपने ज्ञान और बल के घमंड में उसने अधर्म का मार्ग चुन लिया। माता सीता का हरण भी उसी अहंकार का परिणाम था। हालांकि, अशोक वाटिका में कैद रखने के बावजूद रावण चाहकर भी माता सीता को स्पर्श नहीं कर पाया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके पीछे एक भयावह श्राप कारण बना।

वाल्मीकि रामायण में मिलता है श्राप का उल्लेख

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड, अध्याय 26, श्लोक 39 में इस श्राप का विस्तार से वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार, एक समय रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे वरदान मांगने को कहा। रावण ने स्वयं को सबसे बलशाली बनाने का वरदान मांगा, जिसे शिवजी ने स्वीकार कर लिया। इस वरदान के बाद रावण का अहंकार और बढ़ गया और वह तीनों लोकों को जीतने के उद्देश्य से स्वर्गलोक पहुंचा। वहीं उसने अपने भाई कुबेर की नगरी अलका में विश्राम किया।

नलकुबेर के श्राप ने बांध दिए रावण के हाथ

एक दिन स्वर्ग की अप्सरा रंभा, अपने होने वाले पति नलकुबेर से मिलने जा रही थी। रास्ते में रावण ने रंभा को देखकर उसके साथ दुराचार किया। रंभा ने रावण को समझाया कि वह उसके भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर की होने वाली पत्नी है, यानी उसकी पुत्रवधू समान है, लेकिन रावण नहीं माना।

जब यह बात नलकुबेर तक पहुंची, तो क्रोधित होकर उसने रावण को श्राप दिया, "यदि तू किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के बिना स्पर्श करेगा, तो तेरे मस्तक के सौ टुकड़े हो जाएंगे।"यही श्राप कारण बना कि रावण माता सीता को छूने का साहस नहीं कर सका।

अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश

रामायण की यह कथा यह सिखाती है कि चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अधर्म का अंत निश्चित होता है और नारी सम्मान सर्वोपरि है।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं।

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