

धनतेरस 2026 पर यम दीपदान 6 नवंबर, शुक्रवार को किया जाएगा।
नई दिल्ली में यम दीपक जलाने का प्रदोष काल शाम 5:33 से रात 8:09 बजे तक है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यम दीपक सूर्यास्त के बाद जलाया जाता है।
परंपरा के अनुसार, दीपक घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है।
यम दीपदान में मिट्टी का दीपक, सरसों का तेल और रूई की बाती इस्तेमाल करने की मान्यता है।
Dhanteras Yam Deepak: धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की पूजा के साथ यमराज के नाम से दीपदान करने की भी परंपरा है। इसे यम दीपदान या यम दीपक कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन दीपक जलाकर यमराज से परिवार की सुख-शांति और मंगल की कामना की जाती है। लेकिन क्या आप जानते है कि यम का दीपक कितने बजे जलाना चाहिए, इसे कहां रखना चाहिए और इसकी सही विधि क्या है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी जरूरी बातें।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, धनतेरस के दिन यम दीपक प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद जलाया जाता है। वर्ष 2026 में धनतेरस 6 नवंबर, शुक्रवार को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार, इस दिन प्रदोष काल शाम 5:33 बजे से रात 8:09 बजे तक रहेगा। हालांकि, यह समय शहर के अनुसार बदल सकता है। इसलिए अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग में दिया गया समय जरूर देख लें।
मान्यता के अनुसार, यम दीपक घर के मुख्य द्वार के बाहर रखा जाता है। इसे दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखने की परंपरा है। दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना जाता है। हालांकि, घर और परिवार की परंपरा के अनुसार दीपदान की व्यवस्था अलग हो सकती है।
इसके लिए मिट्टी का दीपक लिया जाता है। परंपरा के अनुसार, इसमें सरसों का तेल और रूई की बाती रखी जाती है। कुछ स्थानों पर चार मुख वाला दीपक जलाने की भी परंपरा है। दीपक जलाने से पहले स्थान को साफ कर लें। इसके बाद श्रद्धा से दीपक जलाकर यमराज का स्मरण करें और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।
धार्मिक मान्यताओं में यम दीपदान को परिवार की सुख-समृद्धि और मंगलकामना से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि धनतेरस की शाम यमराज के नाम दीपक जलाने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह परंपरा जीवन के प्रति सम्मान और परिवार की कुशलता की कामना का प्रतीक भी मानी जाती है।
दीपक हमेशा सुरक्षित और स्थिर स्थान पर रखें, जहां उसे किसी के पैर लगने या गिरने का खतरा न हो। जलते दीपक को कपड़ों, पर्दों और अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें। सबसे जरूरी बात यह है कि पूजा श्रद्धा और सहज भाव से करें। अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित रीति-रिवाजों का पालन अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार किया जा सकता है।