विठाबाई के जीवन का एक ऐसा हिस्सा भी है जो सभी के रोंगटे खड़े कर देता है। साल 1967 में जब उनके तमाशा का पूरा दल शिखर शिंगणापुर में रुका हुआ था, तब विठाबाई पूरी तरीके से गर्भवती थीं। एक कार्यक्रम के दौरान ही उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हुई। वहां मौजूद एक बुजुर्ग महिला ने दाई की भूमिका निभाते हुए उनका प्रसव कराया। भारी कमजोरी के बावजूद विठाबाई ने कला के प्रति अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया।