Lala Hardayal Jayanti: कौन थे लाला हरदयाल? जानिए गदर आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान

Lala Hardayal Ghadar Movement History: लाला हरदयाल की जयंती पर देखें तस्वीरों में उनका सफर ऑक्सफोर्ड की छात्रवृत्ति छोड़ने से लेकर गदर आंदोलन की स्थापना तक, आजादी की लड़ाई में उनका अनोखा योगदान।
Lala Har Dayal Biography
लाला हरदयालफोटो सोर्स- सोशल मीडिया
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Lala Har Dayal
14 अक्टूबर को देश उस क्रांतिकारी को याद करता है, जिसने ऑक्सफोर्ड की छात्रवृत्ति ठुकराकर आजादी की राह चुनी। विद्वान, लेखक और गदर आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार लाला हरदयाल की 142वीं जयंती पर देखिए उनके जीवन की प्रमुख झलकियाँ।डिजाइन फोटो
Historical image of Old Delhi
लाला हरदयाल का जन्म 14 अक्टूबर 1884 को दिल्ली में हुआ। उनके पिता गौरी दयाल माथुर अदालत में पदस्थ थे। बचपन से ही वे पढ़ाई में तेज थे और उनकी याददाश्त की चर्चा होती थी। कम उम्र में ही उनमें गहरी जिज्ञासा और स्वतंत्र सोच के लक्षण दिखने लगे थे।फोटो सोर्स- सोशल मीडिया
Old photograph of Government College, Lahore
उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से संस्कृत में स्नातक किया और बाद में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी में एम.ए. की पढ़ाई पूरी की। विद्वत्ता के कारण उन्हें विदेश में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति मिली, लेकिन उनके भीतर ग़ुलामी की पीड़ा लगातार बढ़ती जा रही थी।फोटो सोर्स- सोशल मीडिया
Oxford University
1905 में वे उच्च शिक्षा के लिए ऑक्सफ़ोर्ड गए। वहाँ भारतीय क्रांतिकारियों के संपर्क और ब्रिटिश शासन की सच्चाई देखकर उनका मन बदल गया। 1907 में उन्होंने छात्रवृत्ति और पढ़ाई, दोनों छोड़ दी। माना जाता है कि वे अंग्रेज़ी शासन की नौकरी और सुख-सुविधा को ग़ुलामी का हिस्सा समझते थे।फोटो सोर्स- सोशल मीडिया
Photograph with Lala Hardayal and Lala Lajpat Rai
1908 में भारत लौटकर उन्होंने लाहौर और आसपास सभाओं व लेखों के जरिए जनता को स्वराज के लिए जगाया। वे लाला लाजपत राय जैसे नेताओं के संपर्क में रहे। ब्रिटिश सरकार की निगरानी बढ़ने पर उन्हें देश छोड़कर विदेश से आंदोलन चलाने की राह चुननी पड़ी।डिजाइन फोटो
Old photograph of Paris
विदेश में वे कुछ समय पेरिस में रहे, जहाँ भारतीय क्रांतिकारी साथियों के साथ उन्होंने स्वतंत्रता के विचार को आगे बढ़ाया। इसके बाद वे अमेरिका पहुँचे। वहाँ बसे भारतीय मजदूरों और किसानों की दशा देखकर उन्हें लगा कि इन्हें संगठित कर आजादी की लड़ाई को नई ताकत दी जा सकती है।डिजाइन फोटो
Stanford University campus
अमेरिका में लाला हरदयाल ने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय दर्शन और संस्कृत पर व्याख्यान दिए। वे एक सम्मानित विद्वान के रूप में जाने गए। साथ ही वे भारतीय प्रवासियों से मिलकर उन्हें देश की आजादी के लिए संगठित करने का काम भी चुपचाप करते रहे।डिजाइन फोटो
Group photograph of Ghadar Party members
1913 में अमेरिका के पश्चिमी तट पर "हिंदुस्तान एसोसिएशन ऑफ द पैसिफिक कोस्ट" की स्थापना हुई, जो आगे चलकर गदर पार्टी के नाम से मशहूर हुई। सोहन सिंह भकना अध्यक्ष और लाला हरदयाल महासचिव थे। इस संगठन में पंजाब से गए बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय जुड़े और इसका लक्ष्य हथियारबंद संघर्ष से अंग्रेजी राज को उखाड़ फेंकना था।फोटो सोर्स- सोशल मीडिया
Image of an old issue of the Ghadar newspaper
नवंबर 1913 में सैन फ़्रांसिस्को से "गदर" अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ। इसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का आह्वान छपता था। यह उर्दू और पंजाबी में निकला और बाद में अन्य भारतीय भाषाओं में भी छपा। इसी अखबार के नाम पर संगठन गदर पार्टी कहलाया। इसने प्रवासी भारतीयों में देशभक्ति की चिंगारी जगाई।फोटो सोर्स- सोशल मीडिया
Lala Hardayal Hints for Self-Culture
1914 में अमेरिका में उनकी गिरफ़्तारी हुई, पर जमानत पर छूटकर वे स्विट्ज़रलैंड चले गए। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वे जर्मनी में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों से जुड़े रहे। बाद में वे स्वीडन और इंग्लैंड में रहे, जहाँ उन्होंने बौद्ध दर्शन पर शोध किया और लंदन विश्वविद्यालय से पीएच.डी. हासिल की। उन्होंने "हिंट्स फ़ॉर सेल्फ़-कल्चर" जैसी पुस्तकें भी लिखीं।डिजाइन फोटो
Death of Lala Hardayal
माना जाता है कि ब्रिटिश सरकार ने 1930 के दशक के अंत में उन्हें भारत लौटने की अनुमति दी थी, लेकिन लौटने से पहले ही 4 मार्च 1939 को अमेरिका के फिलाडेल्फिया में उनका निधन हो गया। उनका जीवन बताता है कि आजादी की लड़ाई सिर्फ देश के भीतर ही नहीं, दुनिया भर में लड़ी गई।डिजाइन फोटो

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