Mughal Diwali Celebration: मुगल काल में कैसे मनती थी दिवाली? जानिए लाल किले के जश्न-ए-चिरागां की कहानी

Mughal Diwali Traditions: मुगल काल में दिवाली कैसे मनाई जाती थी? जानिए जश्न-ए-चिरागाँ की कहानी, अकबर की परंपरा, लाल किले का आकाश दीया, आतिशबाज़ी और बहादुर शाह ज़फ़र की लक्ष्मी पूजा।
Jashn E Chiraghan History
मुगल काल में दिवालीडिजाइन फोटो
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Women Lighting Lamps in Mughal Miniature Painting
आज हम जिसे दिवाली कहते हैं, उसे मुगल दरबार में "जश्न-ए-चिरागाँ" यानी दीपों का उत्सव कहा जाता था। क्या बादशाह भी दीये जलवाते थे? क्या महल में आतिशबाज़ी होती थी? अकबर से बहादुर शाह ज़फ़र तक, देखिए मुगल दौर की दिवाली के दस पड़ाव।डिजाइन फोटो
A close-up of a row of lamps
फ़ारसी में "चिराग़" का अर्थ दीपक है और "जश्न" का अर्थ उत्सव। इसी वजह से मुगल दौर में दिवाली "जश्न-ए-चिरागाँ" कहलाई। यह नाम बताता है कि दरबार और शहर में इस त्योहार की पहचान रोशनी से जुड़ी थी। कुछ इतिहास-लेखक यह भी बताते हैं कि मुगलों से पहले दिल्ली सल्तनत के दौर में भी हिंदू त्योहारों को शाही महल के भीतर मनाया जाता था।डिजाइन फोटो
An image of Agra Fort or Fatehpur Sikri
अकबर को आगरा के दरबार में दिवाली मनाने की परंपरा शुरू करने वाला माना जाता है, और उन्हीं से दिवाली पर घेवर, पेठा, खीर, पेड़ा, जलेबी और शाही टुकड़े जैसी मिठाइयाँ बाँटने की रीत जुड़ी बताई जाती है। आगरा किले और फ़तेहपुर सीकरी के महलों में दीप सजाए जाते थे। कुछ विवरणों में यह भी कहा गया है कि दरबार में रामायण का पाठ और कथा-मंचन होता था। अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति इसी रवैये में दिखती है।डिजाइन फोटो
A court scene from the Jahangir era
अकबर के बाद जहाँगीर के समय भी दिवाली का उत्सव दरबार में चलता रहा। बताया जाता है कि इन रातों में दीयों की रोशनी के साथ ताश और जुए की महफ़िलें भी सजती थीं, जो उस दौर के शाही रंगों का हिस्सा थीं। यह दिखाता है कि दिवाली सिर्फ़ पूजा का दिन नहीं, दरबारी मनोरंजन का भी अवसर थी।डिजाइन फोटो
The ramparts of the Red Fort and a tall pillar
शाहजहाँ ने नई राजधानी शाहजहाँनाबाद में लाल क़िला बनवाया और इसके बाद दिवाली का मुख्य उत्सव आगरा से दिल्ली आ गया। उस दौर की सबसे ख़ास परंपरा थी आकाश दीया। इसे लगभग 40 गज़ ऊँचे खंभे पर, 16 रस्सियों के सहारे टिकाकर रखा जाता था, और कई मन बिनौले के तेल से जलाया जाता था, ताकि पूरा दरबार रोशन हो जाए। आकाश दीये की परंपरा शाहजहाँ से जुड़ी मानी जाती है।सौजन्य-सोशल मीडिया
A historical image of the Qutub Minar
मीर आतिश की निगरानी में लाल किले की दीवारों के पास आतिशबाज़ी की जाती थी। कहा जाता है कि कई मुगल महिलाएँ क़ुतुब मीनार पर चढ़कर दिल्ली की रोशनी और पटाखों का नज़ारा देखती थीं। कुछ स्रोत यमुना किनारे भी आतिशबाज़ी की भव्य परंपरा को शाहजहाँ के समय से जोड़ते हैं।सौजन्य-सोशल मीडिया
An interior view of the Rang Mahal in the Red Fort
लाल किले का रंग महल दिवाली के उत्सव का मुख्य केंद्र माना जाता था। यहाँ चारों ओर दीये जलाए जाते थे और महल की खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती थी। एक वर्णन के अनुसार बादशाह को सोने-चाँदी से तौलकर वह धन गरीबों में बाँट दिया जाता था। इस तरह दान की परंपरा भी इस उत्सव का हिस्सा थी।डिजाइन फोटो
Diwali as celebrated by Muhammad Shah 'Rangila'
मुहम्मद शाह रंगीला (लगभग 1719 से 1748) के समय दिवाली और बसंत जैसे उत्सव खूब धूमधाम से मनाए जाते थे। उस दौर की एक मशहूर पेंटिंग में बादशाह को महल के बाहर कुछ महिलाओं के साथ दिवाली का आनंद लेते दिखाया गया है। रंग महल दीयों से जगमगाता था और शहर में भी उत्सव का माहौल रहता था।डिजाइन फोटो
An old photograph of the Delhi Gate
मुगल इतिहास में हर बादशाह का रुख़ त्योहारों के प्रति एक-सा नहीं रहा। कुछ स्रोतों में बताया गया है कि औरंगज़ेब के समय दरबार में होली और दिवाली जैसे समारोहों पर रोक या सख़्ती की बातें मिलती हैं, पर इतिहासकार इस पर अलग-अलग राय रखते हैं। बाद के बादशाहों जैसे फ़र्रुख़सियर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दिल्ली गेट पर दिवाली की रोशनी करवाई।सौजन्य-सोशल मीडिया
A portrait of Bahadur Shah Zafar
आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के समय लाल किले में हर दिवाली पर लक्ष्मी पूजा होती थी, जिसमें हर कोई शामिल हो सकता था। बताया जाता है कि धनतेरस पर वे अफसरों और अमीरों की रसोइयों में तांबे के नए बर्तन भिजवाते थे। किले में आम लोगों और रईसों, दोनों के लिए दिवाली की मिठाइयाँ बनती थीं।डिजाइन फोटो
diyas and kheel-batashe
पुरानी दिल्ली की गलियों में मुस्लिम भुजवा परिवार खील-बताशे बेचते थे। यह दृश्य दिखाता है कि दिवाली सिर्फ़ किसी एक समुदाय का नहीं, पूरे शहर की साझी खुशी बन चुकी थी। मुगल दौर की यही गंगा-जमुनी तहज़ीब आज भी हमें याद दिलाती है कि रोशनी का कोई धर्म नहीं होता।डिजाइन फोटो

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