

Himanta Biswa Sarma vs Gaurav Gogoi: निर्वाचन आयोग ने असम की 126 विधानसभा सीटों के लिए चुनावी कार्यक्रम जारी कर दिया है। राज्य में आगामी 9 अप्रैल को महज एक चरण में मतदान होना तय किया गया है, जबकि 4 मई को नतीजे आएंगे। मुख्य मुकाबला सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के बीच है।
असम की सियासी बिसात बिछ चुकी है। रविवार को चुनाव आयोग द्वारा तारीखों के ऐलान के साथ ही राज्य में चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली 'डबल इंजन' सरकार अपनी उपलब्धियों के दम पर सत्ता बचाने की कोशिश में है, तो दूसरी तरफ गौरव गोगोई के चेहरे के साथ कांग्रेस दलबदल के झटकों से उबरकर वापसी की राह देख रही है। आइए, राज्य के इस महासंग्राम को बारीकी से समझते हैं।
कुल सीटें: 126 मतदान की तारीख: 9 अप्रैल, 2026 नतीजों का दिन: 4 मई, 2026 भाजपा का सफर: 2016 में भाजपा ने पहली बार 60 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की थी, जिसे 2021 में बढ़ाकर 64 कर लिया गया।
| ताकत | भाजपा इस बार अपने मजबूत संगठनात्मक आधार और विभाजित विपक्ष के भरोसे मैदान में है। पार्टी मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मुखर नेतृत्व, विभिन्न विकास परियोजनाओं और विद्रोही समूहों के साथ किए गए शांति समझौतों को अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बार-बार होने वाले दौरों ने ‘डबल इंजन सरकार’ के नैरेटिव को और मजबूत किया है। |
| चुनौतियां | जानकारों के अनुसार, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को उन सीटों पर सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है जहां विकास की चिंताएं अब भी बनी हुई हैं। इसके अलावा “अवैध घुसपैठ” के खिलाफ बयानबाजी के कारण बंगाली भाषी मुसलमानों के बीच विरोध की स्थिति है। विपक्ष द्वारा मुख्यमंत्री और उनके परिवार पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप भी पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं। |
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी उम्मीद गौरव गोगोई हैं, जिन्होंने जोरहाट लोकसभा सीट बड़े अंतर से जीती थी। पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा पेश कर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया है। कांग्रेस को सत्ता-विरोधी लहर और अल्पसंख्यक मतदाताओं (खासकर बंगाली भाषी मुसलमानों) के समर्थन से बड़ी उम्मीदें हैं। वहीं कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी समस्या दलबदल है। हाल ही में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा और तीन अन्य विधायकों का भाजपा में शामिल होना पार्टी के लिए बड़ा झटका रहा। जमीनी स्तर पर एकजुट संगठनात्मक ढांचे की कमी और कभी कांग्रेस का गढ़ रहे चाय बागान मजदूरों का भाजपा की ओर झुकाव कांग्रेस की राह मुश्किल बना रहा है।
असम का यह चुनाव विकास बनाम बदलाव की लड़ाई बनता जा रहा है। जहां भाजपा अपनी संगठनात्मक मशीनरी और कल्याणकारी योजनाओं के दम पर हैट्रिक लगाने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस एनडीए के असंतुष्ट तत्वों और गौरव गोगोई की लोकप्रियता के सहारे सत्ता वापसी का सपना देख रही है। 9 अप्रैल को जनता तय करेगी कि असम की गद्दी पर अगले पांच साल किसका राज होगा।