

Thane Noise Pollution Ganpati Visarjan: ठाणे में 7 दिन के गणपति विसर्जन के दौरान ध्वनि प्रदूषण का स्तर 105 डेसिबल तक पहुंच गया।
डीजे-डॉल्बी पर नियंत्रण के बावजूद ढोल-ताशे, बैंजो, लाउडस्पीकर और बड़े धातु के वाद्य यंत्रों के कारण कई इलाकों में तेज आवाज दर्ज की गई।
ठाणे में गणपति विसर्जन के दौरान इस बार डीजे-डॉल्बी की आवाज भले कम सुनाई दी, लेकिन ध्वनि प्रदूषण पर इसका खास असर नहीं दिखा। विसर्जन शोभायात्राओं में ढोल-ताशे, बैंजो, लाउडस्पीकर और बड़े धातु के वाद्य यंत्रों के इस्तेमाल से आवाज कई जगह 100 डेसिबल के पार पहुंच गई।
रविवार रात अलग-अलग स्थानों पर दर्ज आंकड़ों में ध्वनि स्तर 105 डेसिबल तक पहुंचने की बात सामने आई। इससे एक बार फिर गणपति विसर्जन के दौरान ध्वनि प्रदूषण को लेकर सवाल उठे हैं।
रविवार को शहर में 7 दिन के गणपति का विसर्जन किया गया। दोपहर बाद शुरू हुआ विसर्जन का सिलसिला देर रात तक जारी रहा। गणेश भक्त ढोल-ताशों की धुन और गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या के जयघोष के साथ विसर्जन स्थलों तक पहुंचे।
प्रशासन की ओर से विसर्जन स्थलों पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। हालांकि, शोभायात्राओं के दौरान ध्वनि प्रदूषण का स्तर चर्चा का विषय बना रहा।
राम मारुति रोड पर रात करीब 9:30 बजे ध्वनि स्तर 85 से 90 डेसिबल के बीच दर्ज किया गया। इस दौरान एक के बाद एक गणेश प्रतिमाएं मार्ग से गुजर रही थीं और कई जुलूसों में ढोल-ताशे तथा बैंजो का तेज इस्तेमाल हो रहा था।
बताया गया कि करीब आधे जुलूसों में लाउडस्पीकर का भी इस्तेमाल किया गया। सामूहिक जुलूसों के कारण इस क्षेत्र में औसत ध्वनि स्तर 85 से 95 डेसिबल के बीच रहा।
पांचपाखाड़ी रोड पर रात करीब 10 बजे 90 से 95 डेसिबल ध्वनि स्तर दर्ज किया गया। इसके बाद रात 10:30 बजे ठाणे मनपा कवराली सर्कल क्षेत्र में भी 90 से 95 डेसिबल तक आवाज दर्ज होने की जानकारी सामने आई।
रात 11 बजे के आसपास आईसीआईसीआई बैंक के पास ध्वनि स्तर करीब 100 डेसिबल ध्वनि स्तर से ऊपर पहुंच गया। वहीं रात 11:30 बजे मासुंदा तालाब (तलावपाली) क्षेत्र में भी 100 से 105 डेसिबल तक ध्वनि दर्ज की गई।
इस वर्ष हिंदी फिल्मी गानों का इस्तेमाल कुछ कम दिखाई दिया, लेकिन ढोल-ताशे, बैंजो, लाउडस्पीकर और बड़े धातु के वाद्य यंत्रों की संयुक्त आवाज ने ध्वनि प्रदूषण को कम नहीं होने दिया। कुछ जुलूसों में आतिशबाजी भी की गई।
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. महेश बेडेकर ने इस स्थिति पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कान के पर्दे फटने जैसे मुहावरे का वास्तविक अनुभव लेना हो तो विसर्जन जुलूस में शामिल होना चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों से विसर्जन जुलूसों में ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा उठता रहा है। इस वर्ष भी दर्ज आंकड़ों में ध्वनि की तीव्रता में कोई ठोस कमी दिखाई नहीं देने की बात सामने आई है।