MBMC स्कूलों में माध्यम का सियासी गणित! 60% हिन्दीभाषी बच्चे पढ़ रहे मराठी में, शिक्षण सभापति ने बताई वजह

Mira Bhayandar Schools News: मीरा-भाईंदर मनपा के मराठी स्कूलों में 60% छात्र हिंदीभाषी परिवारों से हैं। 5 गुजराती स्कूल बंद होने और छात्रों को हिंदी में स्थानांतरित करने से नीतिगत बहस शुरू हो गई है।
Mira-Bhayandar: 60% of students in municipal Marathi schools are Hindi speakers
मीरा भाईंदर, प्रतीकात्मक तस्वीरसोर्स- सोशल मीडिया
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Mira Bhayandar Municipal Corporation: मीरा-भाईंदर महानगरपालिका के स्कूलों में शिक्षा के माध्यम को लेकर सियासी और सामाजिक बहस छिड़ने की संभावना है। मनपा के मराठी माध्यम के स्कूलों में करीब 60 प्रतिशत विद्यार्थी हिंदीभाषी परिवारों से होने की जानकारी सामने आई है। वहीं, गुजराती माध्यम के 5 मनपा स्कूल बंद किए जाने के बाद वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों को हिंदी माध्यम में शिक्षा दी जा रही है। ऐसे में मनपा की भाषा आधारित शिक्षा नीति पर सवाल उठने लगे हैं।

36 स्कूलों से शुरू हुआ था 4 भाषाओं का सफर : मनपा क्षेत्र में कुल 36 स्कूल संचालित होते थे। इनमें मराठी, हिंदी, गुजराती और उर्दू माध्यम से विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती थी, लेकिन गुजराती माध्यम के 5 स्कूल बंद होने के बाद वहां के विद्यार्थियों को हिंदी माध्यम में स्थानांतरित किया गया है, और मनपा स्कूल की संख्या 36 से घट कर 31 पर सिमट गई है। साथ ही गुजराती माध्यम में शिक्षा हासिल करने वाले विद्यार्थियों के सामने अपनी मातृभाषा में आगे की पढ़ाई का विकल्प सीमित हो गया है।

हिंदीभाषी बच्चों का मराठी की ओर रुझान

मनपा की शिक्षण सभापति स्नेहा शैलेश पांडे ने इस पूरे मामले पर अलग तस्वीर पेश की है। उनका कहना है कि घोड़बंदर, माशा चा पाड़ा, काशी गांव और मीरा गांव जैसे क्षेत्रों में पहले आदिवासी समाज की आबादी अधिक थी। इसी को ध्यान में रखते हुए वहां मराठी माध्यम के मनपा स्कूल शुरू किए गए थे। बाद में इन इलाकों में उत्तर भारतीय और बिहार सहित हिंदीभाषी नागरिकों की आबादी बढ़ी।

हिंदी माध्यम के स्कूल उपलब्ध नहीं होने के कारण इन परिवारों ने अपने बच्चों को मराठी माध्यम में पढ़ाना शुरू किया। सभापति के अनुसार, कई अभिभावक इससे संतुष्ट है। उनका तर्क है कि हिंदी बच्चे घर पर सीख लेते हैं, जबकि मराठी भाषा बचपन से सीखने का अवसर स्कूल में मिल रहा है।

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गुजराती स्कूल बंद करने के पीछे मनपा का तर्क

गुजराती माध्यम के 5 स्कूल बंद करने के फैसले पर स्नेहा पांडे का कहना है कि मनपा के गुजराती माध्यम के स्कूलों में 7 वीं कक्षा तक ही शिक्षा उपलब्ध थी।

8 वीं कक्षा और आगे की पढ़ाई के लिए पर्याप्त गुजराती माध्यम के स्कूल उपलब्ध नहीं होने के कारण विद्यार्थियों को बाद में माध्यम बदलना ही पड़ता था। इसी वजह से बच्चों को शुरू से ही हिंदी माध्यम में शिक्षा देने का निर्णय लिया गया।

भाषा, शिक्षा और राजनीति, तीनों आमने-सामने

मीरा भाईंदर मनपा के इस फैसले ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है, क्या विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा का विकल्प मिलना चाहिए या उपलब्ध संसाधनों के आधार पर माध्यम तय किया जाना चाहिए? एक तरफ हिंदीभाषी परिवार मराठी माध्यम को स्वीकार कर रहे है, तो दूसरी ओर गुजराती माध्यम के स्कूल बंद होने से गुजराती विद्यार्थियों का हिंदी माध्यम में जाना मनपा की शिक्षा नीति और भविष्य की भाषाई दिशा पर राजनीतिक बहस को हवा दे सकता है।

पूर्व नगर सेवक रोहित सुवर्णा का कहना है कि अब सवाल सिर्फ स्कूलों की संख्या का नहीं, बल्कि मनपा की शिक्षा नीति में मराठी, हिंदी, गुजराती और उर्दू माध्यम के बीच संतुलन का भी है।

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