कल्याण के 47 परिवारों के आशियाने पर मंडराया खतरा! बिल्डर-लैंडलॉर्ड के खेल में फंसे आम लोग; KDMC ने थमाया नोटिस

Kalyan Illegal Buildings: कल्याण पूर्व की 'ओम शिव कृपा' सोसायटी के 47 परिवारों को घर खाली करने का नोटिस मिला है। अवैध निर्माण और जमीन मालिक की संदिग्ध भूमिका ने रहवासियों की नींद उड़ा दी है।
KDMC Fake Fire NOC Bribery Case
कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (सोर्स: सोशल मीडिया)
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KDMC Notice Om Shiv Kripa Society: ठाणे जिले की कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) क्षेत्र में अवैध निर्माणों का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। अभी 65 अवैध इमारतों के घोटाले की गूंज शांत भी नहीं हुई थी कि कल्याण पूर्व के चिंचपाड़ा इलाके से एक नया और दहला देने वाला मामला सामने आया है। यहां स्थित 'ओम शिव कृपा' (A, B और C विंग) को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के करीब 47 परिवारों को नगर निगम ने 15 दिनों के भीतर अपनी छत खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया है।

क्या है पूरा मामला?

ओम शिव कृपा को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी में रहने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह नोटिस किसी बिजली गिरने जैसा है। आरोप है कि इस पूरी साजिश के पीछे खुद जमीन मालिक का हाथ है। चर्चा है कि जमीन मालिक ने खुद केडीएमसी (KDMC) में शिकायत दर्ज कराई है ताकि बिल्डिंग को तुड़वाया जा सके। रहवासियों का आरोप है कि उन्होंने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी लगाकर यहां घर खरीदे थे, लेकिन अब उन्हें सड़क पर आने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

नियमों की धज्जियां और अधूरा कागजी काम

कल्याण-डोंबिवली नगर निगम ने महाराष्ट्र महानगरपालिका अधिनियम की धारा 478 के तहत इस इमारत को अवैध घोषित किया है। जांच में पाया गया कि डेवलपर संजय मिश्रा ने निर्माण के लिए आवश्यक वैध अनुमति और दस्तावेज निगम के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए थे। बिना पुख्ता कागजात के बिल्डिंग खड़ी कर दी गई और रेरा (RERA) के नियमों को ताक पर रखकर फ्लैट बेच दिए गए।

पुराने घोटालों की याद हुई ताजा

यह मामला डोंबिवली के उस कुख्यात 65 अवैध इमारतों के घोटाले की याद दिलाता है, जहां बिल्डरों ने फर्जी दस्तावेज जमा कर रेरा प्रमाणपत्र हासिल किए थे। ओम शिव कृपा सोसायटी का मामला भी उसी पैटर्न पर चलता दिख रहा है, जहां बिल्डर और प्रशासन की शुरुआती लापरवाही का खामियाजा अब बेगुनाह खरीदारों को भुगतना पड़ रहा है। वर्तमान में यहाँ के निवासी कानूनी विकल्प तलाश रहे हैं, लेकिन 15 दिनों की समयसीमा ने उनके पास सोचने का वक्त भी नहीं छोड़ा है।

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