

Neeraj Kaul Arguments In Shiv Sena Symbol Case: महाराष्ट्र के सबसे बड़े सियासी घमासान यानी शिवसेना पार्टी के नाम व उसके आधिकारिक चुनाव चिन्ह 'धनुष-बाण' को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। शीर्ष अदालत के समक्ष बहस के दौरान एकनाथ शिंदे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और पार्टी की आंतरिक कार्यप्रणाली पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने अदालत के सामने कई चौंकाने वाले खुलासे करते हुए बताया कि शिवसेना के भीतर किस तरह वर्षों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया और पारदर्शिता की अनदेखी की जा रही थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता कौल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि शिवसेना पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी कोई नई बात नहीं है। वर्ष 1998 में ही चुनाव आयोग (ECI) ने शिवसेना को एक आधिकारिक पत्र जारी कर सचेत किया था कि पार्टी में पदों पर होने वाली नियुक्तियां लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं। उस समय शिवसेना की ओर से इसका जवाब भी दाखिल किया गया था।
कौल ने ध्यान दिलाया कि चुनाव आयोग के नियमानुसार देश की हर राजनीतिक पार्टी को अपनी लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली तय कर उसे अपने संविधान में दर्ज करना अनिवार्य होता है। इसके अलावा, 2010 के नियमों के तहत पार्टी संविधान में किसी भी संशोधन के लिए 'राष्ट्रीय कार्यकारिणी' की मंजूरी अनिवार्य बनाई गई थी।
शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने दलील दी कि 2018 में पार्टी के संविधान में जो संशोधन किए गए, उसने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को पूरी तरह खत्म कर दिया। इसके जरिए 'पक्षप्रमुख' उद्धव ठाकरे को असीमित शक्तियां दे दी गईं। स्थिति यह बन गई थी कि पक्षप्रमुख और स्वयं पार्टी दोनों एक ही हो चुके थे।
कौल ने कहा कि पार्टी के छोटे से बड़े हर पदाधिकारी को नियुक्त करने का सर्वाधिकार सीधे पक्षप्रमुख के पास चला गया, जिसने सांगठनिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया।
पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर सवाल उठाते हुए शिंदे गुट के वकील कौल ने कहा कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी का चयन 'प्रतिनिधि सभा' द्वारा किया जाता था, जिसमें निचले स्तर के आम कार्यकर्ता की आवाज सुनने का कोई माध्यम नहीं था।
इसके अलावा, 2018 के संविधान के अनुसार कार्यकारिणी में कम से कम 13 सदस्य होने चाहिए थे, लेकिन चुनाव आयोग के पास जमा दस्तावेजों में केवल 9 सदस्यों के नाम दर्ज थे। कौल ने सवाल उठाया कि लाखों कार्यकर्ताओं वाली पार्टी में महज 9 लोगों की कार्यकारिणी यह साफ दर्शाती है कि पार्टी में पारदर्शिता का नामोनिशान नहीं था।
बहस के दौरान एकनाथ शिंदे की शिवसेना के वकील नीरज किशन कौल ने सबसे सनसनीखेज खुलासा यह किया कि जिस पार्टी संविधान का हवाला दिया जा रहा है, वह मूल संविधान चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं था। आयोग के पास दस्तावेज उपलब्ध न होने के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित हो गई थी।
कौल ने निष्कर्ष देते हुए कहा कि जब सांगठनिक ढांचा पूरी तरह अलोकतांत्रिक हो जाए, तो चुनाव आयोग के पास 'विधायी बहुमत' के आधार पर फैसला करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इसी आधार पर आयोग ने शिंदे गुट के पक्ष में असली शिवसेना का फैसला सुनाया था।