

PMC Waste Processing Plant Devachi Uruli: पुणे महानगरपालिका की साधारण सभा में देवाची उरुली स्थित 500 टन प्रतिदिन क्षमता वाले कचरा प्रसंस्करण संयंत्र की निविदा को भारी हंगामे और विपक्ष के विरोध के बीच बहुमत से मंजूरी दे दी गई। सत्तारूढ़ भाजपा और मनपा प्रशासन का दावा है कि नए टेंडर से करीब 150 करोड़ रुपये की बचत होगी। हालांकि, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं।
साधारण सभा में कांग्रेस और NCP के सदस्यों ने टेंडर प्रक्रिया का विरोध किया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि निविदा की शर्तें एक विशेष ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार की गई हैं। विपक्षी सदस्यों ने इसे ‘टेलर-मेड’ टेंडर बताते हुए प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। विपक्ष का कहना है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। इसी मुद्दे को लेकर सभा में काफी हंगामा हुआ।
मनपा के अतिरिक्त आयुक्त प्रजित नायर ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि निविदा प्रक्रिया में केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के सभी निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन किया गया है। उनके मुताबिक, पात्र कंपनियों में सबसे कम दर देने वाली कंपनी का चयन किया गया है।
प्रशासन के अनुसार, इस परियोजना के साथ भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) की ओर से कचरे से बायोगैस बनाने का संयंत्र भी स्थापित किया जाएगा। इससे कचरे के वैज्ञानिक प्रसंस्करण के साथ ऊर्जा उत्पादन को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। मनपा के मुताबिक, पूरी परियोजना को पूरा होने में करीब दो वर्ष का समय लग सकता है। संयंत्र शुरू होने के बाद पुणे शहर से निकलने वाले गीले कचरे के वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण में मदद मिलेगी।
देवाची उरुली परियोजना मनपा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि सितंबर 2027 के बाद खुले खेतों में गीला कचरा डालने पर रोक प्रस्तावित है। ऐसे में शहर में बढ़ते कचरे के निपटारे के लिए पर्याप्त प्रसंस्करण क्षमता तैयार करना जरूरी होगा।
पुणे मनपा प्रशासन को उम्मीद है कि नया संयंत्र शुरू होने के बाद गीले कचरे के वैज्ञानिक प्रसंस्करण की व्यवस्था मजबूत होगी और खुले में कचरा डालने पर निर्भरता कम की जा सकेगी।
500 टन क्षमता वाले संयंत्र को पुणे की भविष्य की कचरा प्रबंधन जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण परियोजना माना जा रहा है।
हालांकि, टेंडर को मंजूरी मिलने के बावजूद विपक्ष की ओर से उठाए गए पारदर्शिता के सवालों ने परियोजना को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है। सत्ता पक्ष जहां इसे आर्थिक बचत और बेहतर कचरा प्रबंधन की दिशा में कदम बता रहा है, वहीं विपक्ष प्रक्रिया की निष्पक्षता पर जवाब मांग रहा है।