'मौत के मुहाने पर थे लाखों यात्री', 22 टन प्रोपलीन, पुणे एक्सप्रेसवे और टैंकर, अगर फटता तो होती भारी तबाही

Propylene Gas Leak: मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर पलटे प्रोपलीन टैंकर से होने वाली तबाही को अमरूद की लकड़ी के ठूंठ ने रोका। 32 घंटे चले ऑपरेशन की पूरी इनसाइड स्टोरी।
Mumbai Pune Expressway Tanker Accident
Mumbai Pune Expressway Tanker Accident (फोटो क्रेडिट-X)
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Mumbai Pune Expressway Tanker Accident: मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर अदोशी सुरंग के पास हुए हालिया हादसे की जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं। जिस '32 घंटे के ट्रैफिक जाम' के लिए प्रशासन की आलोचना हो रही थी, उसके पीछे की सच्चाई यह है कि बचाव दल 22 टन प्रोपलीन गैस के एक 'जीवंत बम' को फटने से रोकने की जद्दोजहद कर रहा था। अगर उस समय एक भी चूक होती, तो यह केवल एक ट्रैफिक जाम नहीं, बल्कि दशकों की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी बन सकती थी।

इस बचाव कार्य में सबसे चौंकाने वाली भूमिका अमरूद (पेरू) के पेड़ की लकड़ी ने निभाई, जिसने एक अभूतपूर्व आपदा को टाल दिया।

10 किलोमीटर का 'डेथ ज़ोन' और प्रोपलीन का खतरा

टैंकर में 22 टन प्रोपलीन गैस भरी थी, जो अत्यधिक ज्वलनशील और खतरनाक होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस टैंकर में विस्फोट होता, तो उसका प्रभाव 10 किलोमीटर के दायरे तक होता।

तापमान का गिरना: रिसाव के समय प्रोपलीन का तापमान -20 से -23 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, जिससे मौके पर बर्फ जमने लगती है।

सांस लेने में दिक्कत: यह गैस गंधहीन होती है, लेकिन शरीर में प्रवेश करते ही फेफड़ों को जाम कर देती है।

हाथों का जलना: टैंकर चालक ने जब रिसाव रोकने की कोशिश की, तो अत्यधिक ठंड (Cold Burn) के कारण उसके दोनों हाथ बुरी तरह झुलस गए।

अमरूद की लकड़ी: विज्ञान और जुगाड़ का अनोखा मेल

जब टैंकर का मुख्य वाल्व टूट गया, तो किसी भी यांत्रिक उपकरण से रिसाव रोकना असंभव था। ऐसे में बचाव दल ने एक प्राचीन और वैज्ञानिक 'जुगाड़' अपनाया, अमरूद के पेड़ की लकड़ी का ठूंठ (Plug)।

नरम और लचीली: अमरूद की लकड़ी प्राकृतिक रूप से नरम और लचीली होती है।

ठंड में फूलना: जैसे ही इस लकड़ी के ठूंठ को वाल्व में डाला गया, अत्यधिक ठंड के संपर्क में आकर यह लकड़ी फूल गई।

एयरटाइट सील: फूलने के बाद इस लकड़ी ने वाल्व को उसी तरह कसकर बंद कर दिया जैसे शराब की बोतल का 'कॉर्क' (Cork) काम करता है। इसी साधारण लकड़ी की बदौलत गैस का रिसाव धीमा हुआ और राहत कार्य आगे बढ़ सका।

36 घंटे का मौत से मुकाबला

बचाव अभियान पूरे 36 घंटे चला। सुरक्षा के लिहाज से मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे को दोनों तरफ 1-1 किलोमीटर तक पूरी तरह खाली कराया गया था। चुनौती यह भी थी कि पास से ही पेट्रोलियम कंपनियों की पाइपलाइन गुजर रही थी। गैस को सुरक्षित रूप से तीन अलग-अलग टैंकरों में स्थानांतरित (Transfer) किया गया। जब हजारों यात्री जाम में फंसे होने की शिकायत कर रहे थे, तब बचाव दल के सदस्य शून्य से नीचे के तापमान और संभावित विस्फोट के साए में अपनी जान दांव पर लगाकर काम कर रहे थे।

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