

नागपुर के शिवाजीनगर उद्यान में ‘दीपसंध्या’ के तहत ‘कुछ यादें कुछ नगमे’ कार्यक्रम आयोजित हुआ।
दिग्गज अभिनेत्री आशा पारेख ने अपने बचपन और नागपुर से जुड़े संस्मरण साझा किए।
फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ के गीत ‘आजा आजा’ की शूटिंग के दौरान हुई एलर्जी का किस्सा सुनाया।
उन्होंने महाराष्ट्र की भाषा और साहित्यिक परंपरा की सराहना की।
30 कलाकारों ने सदाबहार हिंदी फिल्मी गीतों की प्रस्तुति दी।
Asha Parekh Deep-Sandhya: दिग्गज अभिनेत्री, पद्मश्री और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित आशा पारेख के अभिनय सफर की कई दिलचस्प यादें, हिन्दी सिनेमा का सुरीला संगीत और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम 'दीपसंध्या' में उजागर हुए।
शिवाजी महाराज कृति समिति द्वारा शिवाजीनगर उद्यान में आयोजित कार्यक्रम 'कुछ यादें कुछ नगमे' में आशा पारेख की मौजूदगी ने दर्शकों को हिन्दी सिनेमा के स्वर्णिम दौर का एहसास कराया। शेफ विष्णु मनोहर ने आशा पारेख से संवाद साधते हुए उनके बचपन से लेकर फिल्मी सफर की यादों को कुरेदा।
नागपुर शहर से अपने जुड़ाव को याद करते हुए पारेख ने बताया कि मेरी 2 मौसियां नागपुर में रहती थीं, इसलिए जब मैं 8-9 साल की - थी तब अक्सर नागपुर आया करती थी। इसके बाद भी 2 बार आने का अवसर - मिला।
राजेश खन्ना के गानों का एक कार्यक्रम नागपुर में मेरा आखिरी कार्यक्रम था। उन्होंने बताया कि बचपन में वह लड़कों के साथ खेलने वाली 'टॉमबॉय' - स्वभाव की लड़की थीं। उन्होंने शम्मी कपूर - के साथ काम करने के अनुभव, मालवणी - स्टाइल फिश करी और अपनी पसंदीदाखानपान की चीजों पर भी बात की।
पुराने समय की शूटिंग के संघर्ष और अनुभव फिल्मों की शूटिंग के दौरान आने वाली कठिनाइयों पर बात करते हुए आशा पारेख ने बताया कि उस दौर में रिफ्लेक्टर का प्रकाश बहुत तेज होता था जिससे आंखों को तकलीफ होती थी और चश्मा पहनना पड़ता था लेकिन लोग समझते थे कि उन्होंने शराब पी रखी है।
उन्होंने 'तीसरी मंजिल' के मशहूर गीत 'आजा आजा' की शूटिंग की याद साझा करते हुए कहा कि उस गाने की शूटिंग के वक्त मुझे एलर्जी हो गई थी। दोपहर 2 बजे शूटिंग थी और दवा लेने के बाद भी काम करना पड़ा। कलाकार को बुखार हो या तबीयत ठीक न हो, फिर भी काम करना पड़ता है, इसीलिए कलाकार, कलाकार होता है।
आत्मीय स्वागत पर खुशी जताते हुए उन्होंने मराठी भाषा में कहा कि महाराष्ट्र राज्य में जन्म हुआ है, इसलिए मराठी बोलना आना ही चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र की समृद्ध साहित्यिक परंपरा की जमकर प्रशंसा की।
गायक निरंजन बोबडे की संकल्पना और बोबडे व महेंद्र ढोले के संगीत संयोजन में 30 कलाकारों की टीम ने सदाबहार हिन्दी गीतों की प्रस्तुति दी।