Maharashtra Politics News: सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना विवाद पर बुधवार को फिर से सुनवाई शुरू हुई। उद्धव ठाकरे की तरफ से सीनियर वकील कपिल सिब्बल की दमदार दलीलों के बीच चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कई अहम सवाल पूछे, जिसे देखकर ऐसा लग रहा है कि संभावित फैसला बहुत जटिल होगा। सिब्बल ने विस अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के फैसले को गलत बताते हुए कहा कि बाल ठाकरे 2012 में मृत्यु तक पार्टी चीफ थे।
उसके बाद उद्धव ने कमान संभाली। एकनाथ शिंदे ने 2022 तक पार्टी के संविधान को कभी चुनौती नहीं दी। 2018 में उद्धव ने शिंदे को विधायक दल का नेता चुना और स्पीकर और चुनाव आयोग को विधिवत जानकारी भी दी। उद्धव ने शिंदे को चुना था, ऐसे में शिंदे पार्टी के मुखिया कैसे बन सकते हैं। एकनाथ शिंदे को उद्धव ने ही पार्टी का और अपना नहा करेगा। प्रमुख सहायक बनाया। एकनाथ शिंदे ने दगाबाजी करके शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह पर कब्जा करने के लिए षड्यंत्र रचा था। गुरुवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।
सिब्बल बोले कि एकनाथ शिंदे समर्थक विधायकों को बर्खास्त किया गया। दलबदलू चुनाव नहीं लड़ सकते अन्यथा 10वीं अनुसूची निरर्थक होगी। विधायक दल कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है। स्पीकर का फैसला भी गलत है।
वर्षों तक शिंदे समेत बागियों ने कोई शिकायत नहीं की। 2018 में उद्धव ठाकरे ने ही शिंदे को गट नेता और सुनील प्रभु को व्हिप बनाया। विप चुनाव में क्रॉस वोटिंग करके पहले सूरत और फिर गुवाहाटी भाग गए।
पार्टी के संविधान के तहत शिंदे समेत तमाम नेताओं की नियुक्तियों की सूचना विस स्पीकर और चुनाव आयोग को दी गई लेकिन 2018 में आयोग ने कहा कि उसके रिकॉर्ड में संविधान नहीं है। उद्धव और शिंदे दोबारा क्रमशः अध्यक्ष व नेता चुने गए। तब तक किसी को आपत्ति नहीं थी।
सीजेआई ने सिब्बल से पूछा कि क्या अनुच्छेद 11ए की जानकारी जनवरी 2013 में चुनाव आयोग को भेजी गई थी? क्या ठाकरे गुट दस्तावेज पर हस्ताक्षर की पुष्टि कर सकता है?
जब उद्धव को पार्टी अध्यक्ष चुना गया तो एकनाथ शिंदे राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा थे। उद्धव के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया और 2019 लोस चुनाव में पार्टी ने 18 सीटें हासिल की। इसके साथ ही अन्य चुनाव भी लड़े। ये सभी 2013 और 2018 के संविधान के तहत हुए। चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता कि संविधान वैध है या नहीं। फिर भी वह कहता है कि यह रिकॉर्ड पर नहीं है।
इसलिए वह इसे स्वीकार नहीं करेगा। 2019 से 2022 तक जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे, यह मुद्दा नहीं उठाया गया कि 2013 या 2018 का संविधान अस्तित्व में नहीं है। ऐसे में चुनाव आयोग यह कैसे कह सकता है कि वह इसे स्वीकार नहीं करेगा।