शिंदे गुट के हाथ से निकल जाएगा धनुष-बाण? जनता दल के संदर्भ पर बरसे सिब्बल, सीधे चुनाव आयोग पर किया तीखा वार

Supreme Court Shiv Sena Hearing: सुप्रीम कोर्ट में उद्धव गुट की ओर से कपिल सिब्बल ने जनता दल केस का हवाला देते हुए चुनाव आयोग के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए। पढ़ें उनके तर्क की विस्तृत रिपोर्ट।
Supreme Court Shiv Sena Hearing Kapil Sibal On Election Commission
कपिल सिब्बल (सोर्स: एआई फोटो)
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Kapil Sibal Targets Election Commission: महाराष्ट्र की सत्ता की लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। शिवसेना के नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न को लेकर चल रही कानूनी जंग में उद्धव ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तीखे तेवर अपनाते हुए चुनाव आयोग को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है।

CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट के पक्ष में फैसला देते समय एक बड़ी गलती की है।

जनता दल के संदर्भ पर बरसे सिब्बल

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल के निशाने पर चुनाव आयोग का वह तर्क था, जिसमें आयोग ने शिवसेना विवाद का निपटारा करने के लिए जनता दल की फूट का उदाहरण दिया था। सिब्बल ने अदालत में गरजते हुए कहा कि जनता दल और शिवसेना के मामले में जमीन-आसमान का अंतर है और दोनों की तुलना करना पूरी तरह अनुचित है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि जनता दल मामले में अधिवेशनों और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के निर्णयों का कोई पुख्ता रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था, जबकि शिवसेना का मामला पूरी तरह स्पष्ट और दस्तावेजी प्रमाणों पर आधारित है।

जब कार्यकारिणी पर आक्षेप ही नहीं, तो संदर्भ कैसा?

सिब्बल ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु उठाते हुए कहा कि शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर शिंदे या ठाकरे, किसी भी गुट ने कभी कोई आपत्ति दर्ज नहीं की थी।

दोनों पक्षों ने एक प्रकार से इस कार्यकारिणी को स्वीकार किया था। सिब्बल ने सवाल उठाया कि जब संगठन की मुख्य ईकाई पर कोई विवाद ही नहीं था, तो चुनाव आयोग ने जनता दल के उस मामले का सहारा क्यों लिया जहां कार्यकारिणी के अस्तित्व और उसकी बैठकों पर ही सवालिया निशान थे? उन्होंने इसे आयोग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान बताया और आरोप लगाया कि आयोग का निर्णय तथ्यों के बजाय गलत उदाहरणों पर आधारित था।

ईडी-सीबीआई और एसआर बोम्मई केस का जिक्र

बहस के दौरान सिब्बल ने इस बात पर भी जोर दिया कि पार्टी में हुई यह फूट स्वाभाविक नहीं थी। उन्होंने दलील दी कि ईडी और सीबीआई की नोटिसों के माध्यम से विधायकों पर दबाव बनाया गया, जिसने पूरी फूट की कहानी लिखी।

उन्होंने ऐतिहासिक एसआर बोम्मई केस का भी हवाला दिया और यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि लोकतंत्र में बहुमत का परीक्षण केवल संख्या बल से नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रियाओं और पार्टी के मूल संविधान के आधार पर होना चाहिए।

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शिंदे गुट की बढ़ी धड़कनें

कपिल सिब्बल के इन जोरदार तर्कों ने कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। सिब्बल ने कोर्ट को यह समझाने की पूरी कोशिश की कि चुनाव आयोग का फैसला न केवल तकनीकी रूप से गलत है, बल्कि वह शिवसेना के लोकतांत्रिक ढांचे की अनदेखी करता है। यदि अदालत सिब्बल के इस घोर गलती वाले तर्क को स्वीकार कर लेती है, तो चुनाव आयोग के फैसले की वैधता खतरे में पड़ सकती है, जिससे शिंदे गुट के पास मौजूद धनुष-बाण चुनाव चिह्न पर दोबारा संकट के बादल मंडरा सकते हैं।

फिलहाल, इस कानूनी महासंग्राम में कपिल सिब्बल की दलीलों ने उद्धव ठाकरे गुट की उम्मीदों को फिर से हवा दे दी है, जबकि शिंदे गुट की धड़कनें बढ़ गई हैं। पूरी राजनीतिक बिसात अब सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी है।

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